Dharm Desk :- पितृपक्ष का यह समय पितरों के प्रति श्रद्धा और आभार व्यक्त करने का सबसे पावन पर्व होता है। भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इस समयकाल में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और आर्शीवाद के लिए तर्पण तथा अनुष्ठान करते हैं। इन दिनों में पूर्वज सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिए गए अर्पण को स्वीकार करते हैं। पितरों की प्रसन्नता से घर-परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और कष्टों का निवारण होता है। इसी कारण पितृपक्ष के दौरान प्रत्येक मनुष्य को अपने सामर्थ्य अनुसार कार्य करने चाहिए।पितृपक्ष के दौरान भगवान शंकर की आराधना और शिवलिंग पर जल तथा बेलपत्र अर्पित करने का विशेष महत्व है।
भगवान शिव जीवात्माओं और पितरों के परम आश्रयदाता
भगवान शंकर को आशुतोष कहा जाता है।जो बहुत जल्दी खुश होते हैं। भोलेनाथ सभी जीवात्माओं और पितरों के परम आश्रय दाता हैं। यदि कोई मनुष्य व्यस्तता या अभाव में बड़ा अनुष्ठान नहीं कर पाता है तो वह सरल भाव से शिव मन्दिर जाकर जल और बेलपत्र अर्पित करके भी अपने पितरों को तृप्ति प्रदान कर सकता है।पितृपक्ष में शिवलिंग पर समर्पित की जाने वाली इस पूजा विधि को बहुत सरल रखा गया है ताकि कोई भी श्रद्धालु इसे बड़ी आसानी से कर सके। इसके लिए बहुत ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं होती।

शिव पूजन के दौरान अपनाएं यह विधि
सुबह स्नान के बाद एक साफ लोटे में जल भर लें और उसमें गुलाब की कुछ पत्ती मिला लें। इसके साथ तीन साबुत चावल के दाने अक्षत और तीन सुंदर बेलपत्र ले। इसमें चावल के दाने टूटे न हों और बेलपत्र कटे-फटे न हों।
इसके बाद श्रद्धा भाव से शिवमन्दिर जाएं। मंदिर पहुंच कर शिवलिंग के समक्ष आँखें बंद करें और मन में पितरों का स्मरण करें। उसके बाद तीन बार”स्वधा, स्वधा, स्वधा”शब्द का स्पष्ट उच्चारण करें। स्वधा पितरों की तृप्ति का पवित्र माध्यम माना जाता है। इसके बाद जल में चावल के दाने और बेलपत्र डालकर उसे शिवलिंग पर चढ़ा दें। जल चढ़ाते समय भगवान शंकर और पितरों का ध्यान लगातार बनाए रखें।
सीधे जल पितरों तक पहुचता है
‘स्वधा’ शब्द के उच्चारण के साथ जब जल और बेलपत्र भोलेनाथ को अर्पित किए जाते हैं।तो वह अर्पण सीधे पितरों तक पहुचता है। भगवान शंकर स्वयं उस अर्पण को स्वीकार कर पितरों की आत्मा को तृप्ति प्रदान करते हैं। कई बार परिस्थितियोंवश लोग सही समय पर श्राद्ध नहीं कर पाते जिससे पितृ दोष उत्पन्न होता है।पितृपक्ष में किया गया यह सरल प्रयास पितृ दोष के प्रभाव को शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब पितर तृप्त होते हैं तो वे प्रसन्न होकर वंशजों को सुख, समृद्धि और तरक्की का आशीर्वाद देते हैं।

