मनोज परिहार, विदिशा। धनतेरस के पावन अवसर पर धन के देवता और समृद्धि के रक्षक भगवान कुबेर की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना गया है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित जिला संग्रहालय में धनतेरस पर एक बेहद अद्भुत और ऐतिहासिक नजारा देखने को मिला। यहां स्थापित दूसरी शताब्दी की लगभग 14 फीट ऊंची अत्यंत दुर्लभ एवं विशाल कुबेर प्रतिमा का श्रद्धालुओं ने विशेष अनुमति लेकर विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया। देश भर में पटना, भरतपुर और मथुरा के बाद केवल विदिशा ही चौथा ऐसा स्थान है जहाँ भगवान कुबेर की इतनी विशालकाय प्राचीन प्रतिमा स्थापित है।
सालों से जारी है पूजा की अनूठी परंपरा
संग्रहालय में रखी इस अतिप्राचीन प्रतिमा की पूजा करने की परंपरा पिछले 18 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। स्थानीय श्रद्धालु सुशील शर्मा, पंकज जैन और अमित श्रीवास्तव पिछले 18 सालों से नियमित रूप से धनतेरस के दिन जिला संग्रहालय पहुँचते हैं। वे स्थानीय प्रशासन से विशेष अनुमति प्राप्त कर भगवान कुबेर की इस दुर्लभ प्रतिमा का शृंगार और पूजन करते हैं।जिला संग्रहालय में भगवान कुबेर के साथ-साथ उनकी पत्नी देवी यक्षिणी की भी ऐतिहासिक प्रतिमा स्थापित है, जो कला और इतिहास के प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
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1962 में बेस नदी से मिली थी प्रतिमा
इस विशाल प्रतिमा के मिलने की कहानी भी बेहद रोचक और हैरान करने वाली है। वर्ष 1962 में जब विदिशा में अल्प वर्षा के कारण बेस नदी (वेस नदी) का जलस्तर काफी नीचे चला गया, तब नदी के बीचों-बीच लोगों को एक विशाल चट्टान जैसी आकृति दिखाई दी। दरअसल, भगवान कुबेर की यह प्रतिमा नदी में उल्टी अवस्था में पड़ी हुई थी और अनजान ग्रामीण इस पर कपड़े धोया करते थे। जब स्थानीय लोगों और पुरातत्व विशेषज्ञों ने इस विशाल चट्टान को पलटाया, तो सभी हैरान रह गए—वह धन के देवता भगवान कुबेर की विशालकाय प्रतिमा थी।
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सर्किट हाउस से संग्रहालय तक का सफर
1962 में बेस नदी से निकालने के बाद शासन द्वारा इस प्रतिमा को पहले सर्किट हाउस में रखा गया था। इसके बाद वर्ष 1964 में जब विदिशा में जिला संग्रहालय का निर्माण हुआ, तो इस प्रतिमा को संग्रहालय परिसर में ससम्मान स्थापित किया गया। विदिशा की यह 14 फीट ऊंची प्रतिमा न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय इतिहास और प्राचीन मूर्तिकला की एक बेजोड़ धरोहर भी है। धनतेरस के अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
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