Dharm Desk :- भगवान विष्णु की उपासना के लिए एकादशी और द्वादशी तिथियों का विशेष महत्व है। इन्हीं में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पद्मनाभ द्वादशी (22.10.2026) आ रही है। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करने और व्रत रखने का विधान है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से यह व्रत करने से सुख-समृद्धि, सौभाग्य और संतान सुख की कामना पूरी होती है। धार्मिक परंपरा में इस व्रत को श्रद्धा और नियम पूर्वक करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु का स्मरण करके परिवार की खुशहाली और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
कब है पद्मनाभ द्वादशी
पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल द्वादशी तिथि 22 अक्टूबर, गुरुवार को दोपहर 2 बजकर 47 मिनट से शुरू होकर 23 अक्टूबर, शुक्रवार को दोपहर 2 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। कुछ पंचांगों में पद्मनाभ द्वादशी का व्रत 23 अक्टूबर को बताया गया है।
क्या है पद्मनाभ द्वादशी का धार्मिक महत्व
पद्मनाभ भगवान विष्णु का एक प्रमुख नाम है। पौराणिक के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति के समय भगवान विष्णु की नाभि से कमल प्रकट हुआ था। उस कमल पर ब्रह्मा जी विराजमान हुए और उन्होंने सृष्टि की रचना का कार्य आरंभ किया। कमल को संस्कृत में पद्म और नाभि को नाभ कहा जाता है। इसी कारण भगवान विष्णु को पद्मनाभ के नाम से जाना जाता है। चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने की मान्यता है। इस अवधि में उनकी आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। पद्मनाभ द्वादशी पर भगवान विष्णु की पूजा करके श्रद्धालु सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते है।

कैसे करें भगवान पद्मनाभ की पूजा
पद्मनाभ द्वादशी के दिन सुवह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर पूजा करें। भगवान को चंदन, पीले फूल, तुलसी दल, फल और नैवेद्य अर्पित करें। कमल का फूल उपलब्ध हो तो उसे भी पूजा में शामिल कर सकते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और व्रत कथा का श्रवण करना शुभ माना जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान भी किया जा सकता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार उपवास करें और पूजा के बाद भगवान विष्णु की आरती करें।
पद्मनाभ द्वादशी व्रत की कथा क्या है
पद्मनाभ द्वादशी से जुड़ी एक पौराणिक कथा में राजा भद्राश्व का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, एक समय राजा भद्राश्व अपनी वीरता और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। पद्मनाभ द्वादशी व्रत की महिमा बताते हुए ऋषि दुर्वासा ने सत्यतपा मुनि को इस व्रत के पुण्य के बारे में बताया था। इस व्रत कथा में भगवान पद्मनाभ की उपसना और व्रत के प्रभाव को विशेष रूप से बताया है।

