हेमंत शर्मा, इंदौर। शाम ढलते ही जब ढलती धूप के साथ आसमान में हरा गुबार तैरता था, तो इंदौर का दिल कहे जाने वाले रानी सराय और गांधी हॉल के ऊंचे दरख्त चहचहा उठते थे। दिनभर रालामंडल की वादियों में दाना चुगने के बाद, हजारों तोते सुकून की नींद सोने इसी रानी सराय में आते थे। पर अब मेट्रो परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई शुरू होने से इन बेजुबानों के प्राकृतिक आशियाने पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
उनका दर्द कागजों पर लिखे वादों से कैसे बंटेगा
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश और सख्त निगरानी निर्देशों के बाद रानी सराय परिसर में पेड़ों को काटने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अदालत ने 22 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की ऐतिहासिक कोशिश की है। कोर्ट ने साफ किया है कि पेड़ों को एक साथ या अंधाधुंध तरीके से नहीं काटा जाएगा, बल्कि 2500 नए पौधे लगाकर उनका संरक्षण सुनिश्चित करना होगा। लेकिन सबसे मार्मिक सवाल यही बना हुआ है कि जो विशाल दरख्त बरसों में तैयार हुए, उनका दर्द कागजों पर लिखे वादों से कैसे बंटेगा?
हाईकोर्ट के कड़े पहरे में कटाई
हाईकोर्ट के रुख के बाद अब रानी सराय में कटाई का काम अदालत के निर्देशों के तहत ही आगे बढ़ रहा है। कोर्ट ने परिंदों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए आदेश दिया है कि कटाई के दौरान कम से कम दो पक्षी विशेषज्ञ (ऑर्निथोलॉजिस्ट) मौके पर मौजूद रहेंगे। पेड़ों की कटाई और डालियों की छंटाई चरणबद्ध तरीके से होगी—ताकि बरसों से यहाँ सो रहे तोतों को संभलने का मौका मिले और वे आसपास के दूसरे पेड़ों पर अपना नया ठिकाना तलाश सकें। अदालत के निर्देशानुसार, मौके पर मेडिकल किट और जाल के साथ वाइल्डलाइफ रेस्क्यू टीम की मौजूदगी अनिवार्य की गई है, ताकि अगर छंटाई के दौरान कोई पंछी या नन्हा बच्चा ज़ख्मी होकर गिरे, तो उसे तुरंत डॉक्टरी इलाज और सुरक्षा मिल सके।
बेफिक्र परिंदे, अब कहां गुजारेंगे रात?
इंदौर की आबो-हवा में यह परंपरा बरसों से चली आ रही है। रालामंडल के जंगलों से उड़कर तोतों के झुंड हर शाम रानी सराय की घनी शाखों में उतरते थे। रात भर महफ़िल सजती थी और भोर की पहली किरण के साथ वे फिर उड़ जाते थे। हाईकोर्ट ने भी अपने साइट विजिट के दौरान इन हजारों तोतों की मौजूदगी को खुद देखा और समझा। यह महज 182 पेड़ों को हटाने का मामला नहीं है, यह उन हजारों उड़ते परिंदों की सांझ की छत छीनने का संवेदनशील मुद्दा है। वे पंछी जो बरसों से इस पते पर लौटते रहे हैं, जब शाम को लौटेंगे तो अपनी पसंदीदा डाल को गायब पाएंगे।
प्रजनन का मौसम भले न हो, पर हर डाल की जांच के बाद ही चलेगी आरी
विशेषज्ञों के अनुसार, फिलहाल तोतों के प्रजनन का समय नहीं है, इसलिए घोंसलों में अंडे मिलने की संभावना कम है। मगर बेजुबानों की सुरक्षा में कोई चूक न हो, इसके लिए हाईकोर्ट ने बेहद कड़े निर्देश दिए हैं—पेड़ की हर टहनी काटने से पहले यह जांचना अनिवार्य होगा कि वहां कोई घोंसला या परिंदे का बच्चा तो नहीं छिपा है।
कटाई के समय ग्रीन नेट (हरी जाली) का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि आरी की मार और गिरती डालियों से पक्षियों को कोई नुकसान न पहुंचे। अदालत का मकसद यही है कि विकास के काम के दौरान परिंदों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
182 पुराने दरख्तों के बदले 2500 पौधे
182 घने पेड़ों को हटाने के बदले मेट्रो कॉरपोरेशन ने 2500 नए पौधे लगाने का भरोसा दिया है। हाईकोर्ट ने इस आश्वासन का पूरी कड़ाई से पालन कराने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि सिर्फ पौधे रोपकर खानापूरी से काम नहीं चलेगा।मेट्रो कॉरपोरेशन को हर साल अप्रैल के महीने में इन पौधों की देखभाल और प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी, वह भी ‘गूगल सैटेलाइट इमेज’ के साथ! हाईकोर्ट की इस सख्त निगरानी का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कागजों पर लगाए गए पौधे जमीन पर वास्तव में विशाल पेड़ बनकर विकसित हों।
जब तक नन्हे पौधे ‘दरख्त’ न बनें, तब तक कौन देगा पनाह?
2500 नए पौधे लगाना तो पहला कदम है, पर उन्हें उस विशाल दरख्त में तब्दील होने में बरसों लगेंगे जिन पर हजारों तोते रात बिताते थे। छोटे पौधों की डालियां इन परिंदों का भार नहीं संभाल सकतीं।हाईकोर्ट के आदेश में इस बात को गहराई से रेखांकित किया गया है कि जब तक ये पौधे बड़े होकर पक्षियों के लिए रहने लायक नहीं बन जाते, तब तक इनकी लगातार देखरेख और ट्रैकिंग बेहद जरूरी है। अब असली जिम्मेदारी मेट्रो कॉरपोरेशन की है कि वह अदालत के निर्देशों का अक्षरश: पालन करते हुए इन पौधों को पक्षियों का नया आशियाना बनाए।
क्या रंग लाएगी अदालत की यह पहल?
रानी सराय में हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई यह प्रक्रिया आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती को बयां करती है—एक तरफ आधुनिक इंदौर की मेट्रो परियोजना, तो दूसरी तरफ कुदरत की निश्छल चहचहाहट।
माननीय हाईकोर्ट ने मेट्रो के निर्माण कार्य को रोके बिना पक्षियों के अधिकार और पर्यावरण की रक्षा के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाने का मार्ग दिखाया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मेट्रो प्रशासन अदालत के इन संवेदनशील निर्देशों पर पूरी निष्ठा से अमल करते हुए उन 2500 नए पेड़ों को वाकई तोतों का नया ‘घरौंदा’ बना पाएगा?
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