राकेश चतुर्वेदी की कलम से
दिल्ली से भी बताया जा रहा है
पिछले कुछ महीनों से मध्य प्रदेश में दिल्ली दौरे सियासी चर्चा का विषय बने हुए हैं. कुछ दिन तक दौरों पर विराम लगता है, फिर अचानक दिल्ली से तस्वीरें सामने आने लगती हैं. एक तस्वीर आती है और उसके बाद दौरों का सिलसिला तेज हो जाता है. कहने को हर कोई अपने-अपने काम के सिलसिले में समय लेकर दिल्ली जा रहा है. सरकारी कामकाज से लेकर भविष्य की प्लानिंग तक, वजहों की फेहरिस्त लंबी है. अब चर्चा सिर्फ दिल्ली जाकर अपनी बात रखने तक सीमित नहीं रही है. खबर है कि दिल्ली से मुखिया को भी बहुत कुछ बताया जा रहा है. यानी मुलाकातों में सिर्फ कामकाज पर बात नहीं नहीं हो रही, बल्कि जरूरी गतिविधियों के इनपुट भी बता दिए जा रहे हैं. मुखिया अपने कामकाज का रिकॉर्ड पेश करते हैं और लौटते वक्त दिल्ली से मिले अपडेट भी साथ ले आते हैं. इन मुलाकातों में कौन क्या बता रहा है और किसकी बात कितनी अहम है, यह तो मुलाकात करने वाले ही जानें, लेकिन दिल्ली से सिर्फ संदेश नहीं आ रहे, मुखिया तक जरूरी जानकारी भी पहुंच रही है. अब मुखिया को इन इनपुट का लाभ मिल ही रहा होगा.
कलेक्टर के तबादले पर आतिशबाजी
ट्रांसफर लिस्ट में कलेक्टर साहब का नाम क्या आया, आधी रात को ही पटाखे फूटने लगे. वो भी एक जगह नहीं, दो-दो स्थानों पर. आतिशबाजी का अंदाज भी ऐसा कि जश्न तो पूरा हो, लेकिन पटाखे जलाने वालों के चेहरे सामने न आएं. चर्चा है कि कलेक्टर साहब का लोगों के साथ व्यवहार बहुत सहज नहीं था. मुलाकात के लिए कक्ष के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों में अगर लोगों की संख्या ज्यादा दिख जाए तो मुलाकात की संभावना ही कम हो जाती थी. कहा जा रहा है कि ऐसे में कलेक्टर के तबादले की खबर ने कुछ लोगों को जश्न मनाने का मौका दे दिया. हालांकि, कहानी का एक सियासी पहलू भी है. चर्चा यह भी है कि आईएएस साहब की क्षेत्रीय नेताजी से पटरी नहीं बैठती थी. नेताजी की नाराजगी के बावजूद साहब ने पूरे तीन साल तक कलेक्टरी की. अब तबादला हुआ तो आतिशबाजी के पीछे सिर्फ व्यवहार की शिकायतें थीं या सियासी गुणा-भाग भी, इस पर कयास लग रहे हैं. बहरहाल, पटाखे किसने फोड़े, यह भले ही सामने न आया हो, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चाएं खूब हैं. कलेक्टर साहब की रवानगी पर हुआ यह जश्न बता रहा है कि तबादले की खुशी सिर्फ तबादला सूची तक सीमित नहीं रही.
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कार्यक्रम में खाली कुर्सियां
दिग्गज नेता के कार्यक्रम में कुर्सियों की कमी नहीं थी, कमी थी तो उन पर बैठने वालों की. यहां के कार्यक्रमों में आमतौर पर ऐसा नजारा न के बराबर ही देखने को मिलता है, लेकिन इस बार खाली कुर्सियों ने सबका ध्यान खींच लिया. दरअसल नेताजी जनप्रतिनिधियों की बैठक लेने पहुंचे थे. उम्मीद थी कि जनप्रतिनिधियों के साथ लोगों की अच्छी-खासी मौजूदगी रहेगी, लेकिन मौके पर नजारा कुछ और ही था. कुर्सियां इंतजार करती रहीं और लोग नदारद रहे. कार्यक्रम के बीच खाली कुर्सियों की फजीहत से बचने के लिए उन्हें समेटने की कवायद शुरू हो गई. अब सियासी गलियारों में सवाल तैर रहे हैं कि आखिर बैठक में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी कम क्यों रही? आयोजक संख्या का सही आकलन नहीं कर पाए या फिर कार्यकर्ताओं ने ही बैठक से दूरी बनाए रखी? वजह जो भी रही हो, लेकिन इंतजाम और हकीकत के बीच का अंतर साफ नजर आया. वैसे, सियासत में कुर्सियों का अपना अलग ही महत्व है. कभी कुर्सी पाने के लिए जोर लगाया जाता है, तो कभी खाली कुर्सियां भरने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती है. कार्यक्रम का यह नजारा भी कुछ ऐसा ही संदेश छोड़ गया.
राज कर आए अब बड़े शहर में कमाल नहीं कर पाए
जिलों में रहकर आमजन के दिलों पर राज किया तो सूबे में तारीफों के खूब पुल बंधे. शासन भी इस कामकाज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया. नतीजा यह हुआ कि दो आईएएस अफसरों को बड़े शहर की कमान इस उम्मीद के साथ सौंप दी गई कि जिलों में अपनी कार्यशैली से पहचान बनाने वाले ये अफसर अब मेट्रो शहर में भी जनता का दिल जीतेंगे. शुरुआत उम्मीदों के मुताबिक ही रही. जिलों से विदाई हुई तो पालकी तक सजी और बड़े शहर में आमद हुई तो लगा कि सरलता और प्रशासनिक कसावट का ऐसा संगम अब यहां भी देखने को मिलेगा. पहले एक-दो महीने इस बात की आहट भी हुई, लेकिन धीरे-धीरे दोनों ही मुख्यालयों में हालात पुराने ढर्रे पर लौटने लगे. अब सवाल यह कि जिलों में जो अफसर सीधे जनता की सुनते थे, बड़े शहर में आकर उनकी कार्यशैली क्यों बदल गई? दलील दी जाने लगी कि यहां हर कोई राज्य स्तरीय नेता है या फिर बड़ा अफसर है. किसकी सुनें और किसकी नहीं, इसी उधेड़बुन में पल-पल प्लानिंग बदलनी पड़ती है. यानी जिलों में जो सादगी और कसावट काम आई, वही बड़े शहर के सियासी और प्रशासनिक दबाव में कहीं पीछे छूट गई. अब नतीजा सामने है. आम जनता के आवेदन हों या लोगों की फिजिकल हाजिरी, व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट गई है. जिन अफसरों से बड़े शहर में नई कार्यसंस्कृति की उम्मीद थी, उनके सामने भी वही पुरानी चुनौतियां जस की तस खड़ी हैं.
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अस्पताल में PET स्कैन फाइल का इलाज जारी है
मध्यप्रदेश के एक शहर में बने देश के नामी सरकारी अस्पताल में मरीजों को PET स्कैन की सुविधा कब मिलेगी, इसका जवाब देते-देते दो मुखिया बदल गए. अब तीसरे की आमद भी हो चुकी है, लेकिन सुविधा कब शुरू होगी यह मशीन से ज्यादा शायद फाइल को ही पता हो सकता है, क्योंकि समय लगातार गुजरता जा रहा है. हर बार तैयारी पूरी होने की बातें होती रहीं, लेकिन मशीन शुरू होने की तारीख अब तक नहीं आ पाई है. बड़ी बात ये है कि असली कारण भी अफसर नहीं बता पा रहे हैं, लगता है इसकी वजह भी फाइल को ही पता होगी. अस्पताल आने वाले मरीजों की बीमारी अपनी जगह है और फाइल की बीमारी अपनी जगह बरकरार है. इस बीच आए दोनों मुखिया में झटपट मशीन का बटन ऑन करने का वादा किया मगर सफल होने से पहले ही एक-एक कर विदा हो गए. अब तीसरे मुखिया ने उम्मीद दिखाई हैं कि उनके आने से मशीन का उद्घाटन हो ही जाएगा. लगता है सरकारी अस्पताल में मुखिया बदलने की रफ्तार तेजी से दौड़ रही हो, लेकिन मशीन शुरू होने की रफ्तार देखकर लगता है कि सिस्टम अभी वार्मअप ही कर रहा है. उधर, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को PET स्कैन के लिए निजी अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं. वहां जांच के साथ जेब का भी पूरा इम्तिहान होता है. मरीज बीमारी से लड़ें, महंगी जांच का खर्च उठाएं या सरकारी अस्पताल में सुविधा शुरू होने का इंतजार करें. यानी विकल्प कम और परेशानी ज्यादा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर फाइल में ऐसा कौन-सा पेंच है, जो खुलने का नाम नहीं ले रहा?
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