राकेश चतुर्वेदी की कलम से
राम-हनुमान भरोसे नैया डार दई
मध्य प्रदेश में लंबे समय से डगमगाती सियासी नैया को किनारे लगाने के लिए एक प्रमुख पार्टी में इन दिनों तरह-तरह के जतन चल रहे हैं. संगठन की बैठकों से लेकर राष्ट्रीय चेहरों को मैदान में उतारा जा रहा है. इसी बीच पार्टी के एक प्रमुख नेता ने नैया को कुछ अलग ही सहारे से पार लगाने की तैयारी कर ली है. चर्चा है कि प्रमुख पद की जिम्मेदारी संभाल रहे नेताजी अब राम और हनुमानजी की कथा के जरिए पुराना अध्याय दोहराने जा रहे हैं. इसी महीने से कथा का सिलसिला शुरू होने की खबर है. पहले चरण में चार स्थानों पर कथा की तारीखें भी तय कर की गई हैं. इसके बाद थोड़ा विराम होगा और फिर आगे की तारीखों का कार्यक्रम बनाया जाएगा. अब नेताजी कथा कहेंगे तो कथा के प्रसंगों में सियासत का जिक्र छिड़ भी सकता है और छिड़ा तो कथाओं के माध्यम से ही श्रद्धालुओं को समझाया जाएगा. कथा में भगवान राम की गाथा के साथ समकालीन राजनीति के संदर्भ भी सुनाई दे सकते हैं. खासकर उन लोगों के लिए संदेश देने का प्रयास किया जाएगा जो भगवान के नाम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक मतलब के लिए करने का दुस्साहस करते हैं. रामकथा के बीच हनुमानजी के ‘मैनेजमेंट फंडे’ भी लोगों तक पहुंचाने की तैयारी है. यानी भक्ति के साथ नेतृत्व, संगठन, अनुशासन और संकट प्रबंधन का पाठ भी पढ़ाया जाएगा. अब तक कांग्रेस में नैया पार लगाने के लिए रणनीति, संगठन और सियासी समीकरणों पर भरोसा किया जाता रहा है, लेकिन नेताजी ने शायद समझ लिया है कि जब सियासी नैया लगातार हिचकोले खा रही हो, तो राम नाम की पतवार और हनुमानजी के मैनेजमेंट समझाने में कोई हिचक नहीं होना चाहिए.
तस्वीरें और मायने अलग-अलग
मध्यप्रदेश की सियासत में पिछले दिनों से कुछ वीडियो और तस्वीरों ने ऐसी दौड़ लगाई कि मीडिया पीछे छूट गई और मोबाइल आगे निकल गए. जिसे जो तस्वीर मिली, उसने अपने हिसाब से उसका मतलब निकाल लिया. किसी को उसमें दोस्ती दिखी, किसी को दुश्मनी और किसी ने तो आगे की पूरी पटकथा तक लिख डाली. मगर सियासत में तस्वीरों का फायदा और नुकसान दोनों हैं, क्योंकि कैमरा सामने का दिखाता है, पीछे का नहीं. अब धीरे-धीरे खबर छनकर आ रही है कि जिन तस्वीरों को देखकर जो कयास लगाए जा रहे थे उनमें मामला कुछ और ही था. यानी जो दिख रहा था, जरूरी नहीं कि वही सच हो और जो सच था, वह कैमरे की नजर में आया ही नहीं. भोपाली अंदाज में कहें तो मामला कुछ ऐसा है कि तस्वीर देखकर कई लोग समझें कि दाल पक रही है, जबकि भगोने में कुछ और ही खदबदा रहा था. सबसे मजेदार बात यह कि तस्वीरें वायरल होने के बाद व्याख्याकारों की पूरी जमात मैदान में उतर आई. कोई रिश्ते जोड़ रहा था, कोई समीकरण. कोई नई कहानी बना रहा था तो कोई पुरानी कहानी में नया अध्याय जोड़ रहा था, लेकिन जिन चुनिंदा चेहरों को तस्वीर के पीछे की तस्वीर मालूम थी, वे इस पूरे तमाशे को चुपचाप देखते रहे. अब सवाल यह नहीं कि तस्वीर में क्या था. सवाल यह है कि तस्वीर में जो नहीं था, वही असली कहानी तो नहीं? फिलहाल भोपाल में फुसफुसाहट है. तस्वीरें वायरल थीं, मगर मायने ऑफलाइन थे.
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सड़कें वाले मंत्री की ही नहीं सुन रहे
मध्य प्रदेश की सड़कों के गड्ढों ने जब चांद की सतह को मात दीं तो तस्वीरें खूब वायरल हुईं. मामला गरमाया, समीक्षा हुई और विभागीय मंत्री ने सड़कों को जल्द दुरुस्त करने के निर्देश दे दिए. लगा अब गड्ढों की छुट्टी तय है, लेकिन लगता है आदेश सड़क तक पहुंचते-पहुंचते कहीं रास्ता ही भटक गया है. ये इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आदेश दिए काफी वक्त गुजर चुका है और इतने समय में तो सड़कें चार बार सुधर सकती थीं. मगर कई जगह गड्ढे अब भी जस के तस हैं. चकाचक सड़क की उम्मीद तो दूर, ढंग से गड्ढे भरने का काम भी रफ्तार नहीं पकड़ पाया है. अब विभाग के गलियारों में चर्चा है कि मामला सड़क का है या अफसरशाही का. मंत्री जी आदेश दे रहे हैं और सड़क वाले शायद उसे सुनने के लिए अपनी ही रफ्तार से चल रहे हैं. तंज करने वाले तो यही कह रहे हैं कि मंत्री की बात अगर सड़क तक नहीं पहुंच रही, तो फिर जनता के दिल तक कैसे पहुंचेगी.
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कैंटीन वाली थाली
खेल कूद वाले दरबार में इन दिनों कैंटीन वाली खास थाली खूब चर्चा में है. चर्चा है कि थाली वाले भैया पिछले एक दशक से ज्यादा समय से कैंटीन की कमान संभाले हुए हैं. कहा जाता है कि पुराने साहब के दौर में थाली वाले भैया पर खूब मेहरबानी रही, लेकिन काम देने वाले अब पुराने साहब रिटायर हो चुके हैं और विभाग में नए साहब की एंट्री हो गई है. नए बाबू के आने के बाद अब थाली वाले भैया की चिंता बढ़ने की चर्चा है. गलियारों में कानाफूसी है कि कही सालों से हाथ में चली आ रही थाली इस बार हाथ से न निकल जाए. चर्चा तो यह भी है कि पुराने दौर में थाली वाले भैया पर खूब आशीर्वाद रहा. इसी ‘आशीर्वाद’ और पुराने साहब की मेहरबानी के चलते एक ही व्यक्ति के पास इतने लंबे समय तक कैंटीन का खेल चलता रहा. थाली वाले भैया तो यहां तक मान रहे हैं कि भले ही साहब बदल गए हो लेकिन ऊपर वाला हाथ तो अपने सर पर है ही. अब देखना दिलचस्प होगा कि नए बाबूजी के दौर में थाली वही रहती है या कोई नया खिलाड़ी एंट्री मारता है.
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