राकेश चतुर्वेदी की कलम से
मंच पर उपस्थित-अनुपस्थिति से तय हो रहीं सियासी तस्वीरें…
ग्वालियर-चंबल का यह इलाका अपनी दो बातों के लिए दुनिया भर में मशहूर है-पहला, बिना किसी बात के तुरंत ‘फैसला’ ऑन द स्पॉट कर देना और दूसरा, यहां का पानी जो सीधा मिजाज में चढ़ता है! लेकिन इन दिनों यहां एक तीसरा नया शगल शुरू हुआ है, जिसे सियासी जुबान में कहते हैं-‘मंच-विद्या’। सार्वजनिक आयोजनों में मंच, माइक और बैनर पर छपी नेताओं की तस्वीरें तो एक ही होती हैं, लेकिन असली खेल कुर्सी के गणित का चल रहा है। किस दिग्गज नेता की मौजूदगी दर्ज हुई और कौन गायब हो जाए, अब इसी से क्षेत्र का राजनीतिक तापमान तय हो रहा है।
इस तरह की घटनाओं को लेकर अंचल की राजनीतिक फिजाओं में अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। हालांकि इन घटनाओं के पीछे वजह क्या रही इसे लेकर संबंधित नेताओं की ओर से कोई स्पष्ट राजनीतिक टिप्पणी सामने नहीं आ रही है। इसी बीच अंचल में संगठनात्मक बदलावों के साथ पुराने सियासी समीकरणों को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। नए चेहरों को जिम्मेदारियां मिलने और पहले से प्रभावशाली नेताओं की भूमिका के बीच संतुलन का सवाल स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन रहा है। ग्वालियर-चंबल की राजनीति में नेताओं की मौजूदगी लंबे समय से अपने आप में एक संदेश मानी जाती रही है। ऐसे में किसी मंच पर साथ दिखाई देना हो या किसी आयोजन में प्रमुख चेहरे की अनुपस्थिति दोनों ही स्थितियां राजनीतिक नजरों से देखी जा रही हैं। खास बात यह है कि अंचल में सामने आए ऐसे अलग-अलग घटनाक्रमों ने प्रदेश नेतृत्व का ध्यान भी स्वाभाविक रूप से खींचा है। सवाल यह नहीं कि पार्टी में क्या हो रहा है, बल्कि सवाल यह है कि इन घटनाओं के पीछे बदलते संगठनात्मक समीकरण हैं, स्थानीय स्तर का समन्वय है या फिर नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक कार्यक्रम। फिलहाल सार्वजनिक तौर पर संगठन की एकजुटता ही दिखाई देती है और किसी नेता की ओर से मतभेद या खेमेबंदी को लेकर कोई खुला बयान नहीं आया है लेकिन राजनीति में कई बार मंच पर मौजूदगी जितना संदेश देती है, उतना ही संदेश किसी महत्वपूर्ण मौके पर अनुपस्थिति भी छोड़ जाती है। इलाके में फिलहाल इन्हीं तस्वीरों और घटनाक्रमों को जोड़कर सियासी गलियारों में नई चर्चाएं आकार ले रही हैं।
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मंत्री-पूर्व मंत्री की रस्साकस्सी से और उलझ रही गांठ
संस्कारधानी के रूप में मशहूर मध्य प्रदेश के एक अहम इलाके की सियासत में इन दिनों एक जबरदस्त ‘टंग ऑफ वार’ यानी रस्साकशी का खेल चल रहा है। मजेदार बात यह है कि इस खेल में रस्सा खींचने के लिए किसी मैदान की जरूरत नहीं पड़ी, रस्से का एक सिरा माननीय मंत्री जी के हाथ में है और दूसरा पूर्व मंत्री जी ने मजबूती से थाम रखा है। यह पूरी खींचतान बयानों, लेटर-पैड और सोशल मीडिया के डिजिटल अखाड़े में लड़ी जा रही है। मुद्दा चाहें कोई भी हो जनता और राजनीतिक पंडितों की निगाहें सिर्फ इस बात पर टिकी रहती हैं कि इस बार रस्से की गांठ कितनी कस रही है। अगर बात सिर्फ नीतियों की होती तो इसे वैचारिक मतभेद मानकर टाल दिया जाता। लेकिन जब हर हमला एक ही निशाने पर हो तो सियासी गलियारों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह जनहित की चिंता है या पुराना हिसाब-किताब बराबर करने की कवायद!
इस स्थानीय घमासान की आंच अब भोपाल से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों तक पहुँचने लगी है। पूर्व मंत्री जी के तेवरों का आलम यह है कि उनका लेटर-पैड और सोशल मीडिया हैंडल एक पल को भी शांत बैठने का नाम नहीं ले रहे। राजनीति में असहमति होना कोई अनोखी बात नहीं है और लोकतंत्र में अपनी बात रखना सबका हक है। लेकिन जब घर की खींचतान रोज़ सड़क पर आकर होने लगे तो संदेश सिर्फ असहमति का नहीं रहता, बल्कि यह साफ-साफ आर-पार की जंग नजर आने लगता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह रस्साकशी यूं ही चलती रहेगी या कोई समझदार खिलाड़ी इस गांठ को खोलने की पहल करेगा? क्योंकि इतिहास गवाह है-राजनीति का रस्सा कितना भी मजबूत क्यों न हो, अगर दोनों तरफ से उसे हद से ज्यादा खींचा जाए तो आख़िरकार रस्सा ही टूटता है और साथ ही साथ पुराने रिश्ते भी!
नंबर बढ़ाने की कवायद लेकिन नाम छूट गया
विधानसभा चुनाव की हल्की-हल्की आहट क्या शुरू हुई, पूर्व मंत्री जी भी अपने सियासी नंबर बढ़ाने की जुगत में पूरी जी-जान से जुट गए। खबर गर्म है कि नौकरी के कुछ दावेदारों को पूर्व मंत्री जी ने खुद बड़े साहब के कार्यक्रम तक पहुंचाने में मदद की ताकि साहब के सामने उनकी मांग ज़ोर-शोर से रखी जा सके। अब जब इतनी निस्वार्थ सेवा और कड़ी मेहनत की थी, तो थोड़ा-बहुत सियासी कमीशन तो बनता ही था!
इसीलिए पूर्व मंत्री जी ने बातों-बातों में अपनी एक छोटी-सी शर्त रख दी- ‘भैया मंच से हमारा नाम ज़रूर ले लेना!’ आखिर बड़े साहब के सामने अपनी वफ़ादारी और मौजूदगी दर्ज कराना भी तो जरूरी था, क्या पता यही नाम आगे चलकर फिर से मुख्य धारा और सत्ता के मुख्य दरवाजे की चाबी बन जाए! लेकिन पूरी पटकथा में असली ट्विस्ट तब आया, जब नौकरी के दावेदारों ने मंच हाथ में लिया। उन्होंने अपनी मांगें पूरी बेबाकी से बड़े साहब के सामने रखीं, अपनी बात पहुंचाई, लेकिन जिस एक नाम को सुनने के लिए पूर्व मंत्री जी कान खड़े किए बैठे थे, वही नाम पूरे भाषण से गोल रहा!
अब सियासी गलियारों में चटकारे लेकर चुटकी ली जा रही है कि भाई दावेदार भी पहुंच गए, मांग भी बड़े साहब के कानों तक पहुंच गई, बस पूर्व मंत्री जी का नाम रास्ते में ही कहीं रास्ते में अटक गया! साहब ने स्कोरकार्ड में पूरे नंबर जोड़ने की पूरी तैयारी कर रखी थी, पर अफ़सोस, रिपोर्ट कार्ड पर नाम ही दर्ज नहीं हो पाया। नतीजा? पूरी मेहनत, सजा हुआ मंच और सामने बैठे बड़े साहब… फिर भी नंबर बढ़ाने की कवायद शून्य पर ही सिमट गई। कहते हैं राजनीति में किसी के कंधे पर बैठकर मंज़िल तक पहुंच तो सकते हैं, लेकिन अपनी हाजिरी का ढोल खुद ही पीटना पड़ता है। इस बार साहब यह सबक तो सीख ही गए होंगे कि सियासी मदद करना तो आसान है, मगर दूसरों के मुंह से मंच पर अपना नाम निकलवाना सबसे टेढ़ी खीर है!
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दफ्तर बना ट्रांजिट पॉइंट
राजधानी के एक महकमे में इन दिनों फाइलों पर जमी धूल से ज्यादा बड़े साहब के फ्लेक्सिबल टाइमटेबल के चर्चे गर्म हैं। विभाग का असली नाम बताना तो सियासी शिष्टाचार के खिलाफ होगा, लेकिन दफ्तर के गलियारों में इसे अब प्यार से सैर-सपाटा विभाग कहा जाने लगा है। चर्चा है कि बड़े साहब की दफ्तर में मौजूदगी अब किसी ईद के चांद से कम नहीं रही। अगर कभी भूल-भटके दर्शन हो गए तो ठीक, वरना बेचारगी से घिरे कर्मचारी फाइलों का पहाड़ सामने रखकर बस साहब की राह तकते रहते हैं। और साहब जब तशरीफ लाते भी हैं, तो फाइलों पर दो-चार सरसरी नजरें दौड़ाकर ऐसे रफ़ूचक्कर हो जाते हैं मानो दफ्तर न हो, कोई ‘एयरपोर्ट का ट्रांजिट पॉइंट’ हो!
इस ‘नए दौर’ को देखकर कर्मचारियों को अब पुराने कड़क साहब की याद सता रही है। वे साहब वक्त के इतने पाबंद थे कि उनके आने-जाने से लोग घड़ियां मिलाते थे। पर अब जब मुखिया जी का ही अपना टाइमटेबल ‘रबड़ की तरह’ खींचता-सिकुड़ता हो, तो छोटे साहबान भला घड़ी की सुइयों से क्यों बंधे रहें? नतीजा यह है कि कर्मचारियों ने भी इस नई कार्यसंस्कृति को सहर्ष स्वीकार कर लिया है। जैसे ही बड़े साहब की गाड़ी गेट से बाहर निकली, धीरे-धीरे कुर्सियाँ भी अपना वजूद खोने लगती हैं। चाय की चुस्कियों के साथ अब दफ़्तर में एक अनौपचारिक फॉर्मूला बेहद हिट हो चुका है-“साहब दिखे तो ऑफिस, साहब निकले तो ऑफ!” यह सही है कि ये सब बातें चाय की चुस्कियों और गलियारों की गपशप का हिस्सा हैं, पर इस मजाक के पीछे एक कड़वा सवाल जरूर छिपा है-अगर विभाग का कप्तान ही ‘कभी-कभार’ की हाज़िरी पर आ जाए, तो फाइलों, फैसलों और जनता के कामकाज की रफ्तार की नब्ज आख़िर कौन थामेगा?
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