राकेश चतुर्वेदी की कलम से

राष्ट्रीय नेता बनने की तैयारी, बेटे को सियासी विरासत

राजनीति के रंगमंच से ताज़ा सियासी पटकथा सामने आई है जिसका सीधा सा फलसफा है “पापा चले दिल्ली, बेटा संभाले गिल्ली!” मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से चौके-छक्के लगा रहे हमारे माननीय नेताजी को अब भोपाल का मैदान छोटा लगने लगा है और वे राष्ट्रीय राजनीति के कैनवास पर बड़ा मुस्लिम चेहरा बनने का सपना देखकर दिल्ली की फ्लाइट पकड़ने की होड़ में हैं, तो दूसरी तरफ लगे हाथ अपने लाडले के लिए लोकल सीट का रिजर्वेशन पक्का करके फैमिली पैक योजना को अंजाम दे रहे हैं; उधर राजनीति के पुराने पंडित भी चाय की चुस्कियों के साथ हंसकर कह रहे हैं कि जब बाकी दिग्गजों के चिराग अपनी विरासत संभाल ही चुके हैं तो भला ये नेताजी अपने शहजादे की ताजपोशी में पीछे क्यों रहें, क्योंकि आखिर में पापा के बाद बेटा ही तो भारतीय राजनीति का सबसे हिट और ट्राइड-एंड-टेस्टेड प्रोडक्ट है जो हर चुनावी दुकान पर बिना किसी वारंटी के भी सबसे पहले बिक जाता है!

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UGC के सवाल पर सवर्ण नेता मौन और विधायक जी की एग्जिट

देश में जातिगत राजनीति का पारा वैसे ही हाई रहता है, लेकिन ग्वालियर-चंबल से उठे यूजीसी के नए बवाल ने सवर्ण नेताओं का पसीना छुड़ा दिया है। बेचारे नेताजी लोग पिछले कई दिनों से इस मुद्दे पर ऐसे कन्नी काट रहे थे, जैसे रोड पर कोई पुराना उधार मांगने वाला दिख जाए! पर असली वाक्या तो तब हुआ जब विंध्य के दौरे पर आईं एक माननीय महिला विधायक जी सीधी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आ फंसीं। मैडम जी तो बड़े ढोल-नगाड़े के साथ किसी राष्ट्रीय अभियान की ब्रांडिंग करने पधारी थीं, पर वहां मौजूद रिपोर्टरों ने आउट-ऑफ-सिलेबस सवाल दाग दिया “मैडम, यूजीसी वाले मुद्दे पर क्या कहेंगी?” बस फिर क्या था! सवाल सुनते ही विधायक जी का सॉफ्टवेयर क्रैश हो गया। सामने दर्जनों चालू कैमरे देख गुस्सा तो इतना आया कि चाय का कप उठाकर फेंक दें, लेकिन कैमरा कॉन्शियस नेताजी मुस्कुराना भी नहीं छोड़ सकती थीं। तो भारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचानक मौन व्रत धारण कर लिया गया और मैडम जी बिना कुछ बोले, मंद-मंद मुस्कुराते हुए वहां से ऐसे रफूचक्कर हुईं जैसे क्लास में सरप्राइज टेस्ट मिलते ही बैकबेंचर्स गायब होते हैं! अब स्थिति यह है कि सवर्णों की बदौलत कुर्सी पर बैठे नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें आ गई हैं और इस साइलेंट एग्जिट पर खुलकर बोलने को कोई तैयार नहीं है… क्योंकि सबको पता है, अगली बार माइक सामने आया तो मौन रहने से भी काम नहीं चलेगा!

अथ श्री सड़क-सांसद कथा

विंध्य क्षेत्र के सीधी जिले में सड़क का मुद्दा इतना पुराना हो चुका है कि अब तो लगता है सड़क की फाइल को किसी ने अमर होने का वरदान दे दिया है। स्थानीय चौपालों से शुरू हुई चीख-पुकार दिल्ली तक गूंज गई, पर मजाल है कि सड़क की प्लानिंग एक इंच भी आगे खिसकी हो। लगता है फाइल को किसी ने चिपका दिया हो। इसी सड़क के गड्ढों में हिचकोले खाते-खाते क्षेत्र की निवासी अचानक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बन गईं। मतलब सड़क भले न बनी, लेकिन दीदी का डिजिटल करियर ज़रूर बन गया! अब बारिश फिर ढलने को है, गड्ढों में पानी भर चुका है, और लीला जी ने इस बार सांसद जी को सीधे पौराणिक वार्निंग दे डाली है। उनका कहना है “एक नारी लंका और रावण का विनाश कर सकती है! तुम तो सिर्फ एक सांसद हो… साम्राज्य खत्म हो जाएगा तुम्हारा! अगर इस साल काम शुरू नहीं हुआ तो सांसदी चली जाएगी!” वार्निंग में पूरा फिल्मी ड्रामा और पौराणिक तेवर थे, पर हमारे सांसद जी ठहरे ‘अति-शांत चित्त’ ज्ञानी! वे मन ही मन मुस्कुरा कर सोच रहे होंगे कि “अरे देवी जी! मांग करना जनता का धर्म है, वो तो करती रहेगी। अभी चुनाव थोड़ी न कल सुबह हैं! और वैसे भी, हमारी सांसदी की लीला किसी लीला के बयान से तय नहीं होती, वो तो टिकट बांटने वाले आकाओं की कृपा से तय होती है!” आपको याद दिलाते चलें, यह वही ऐतिहासिक सड़क है जहां कुछ समय पहले जब प्रसव पीड़ा से जूझती महिला के लिए सड़क मांगी गई थी तो सांसद जी ने सीधे एविएशन मोड ऑन कर दिया था। भारी आत्मविश्वास से कहा था कि “घबराओ मत! लेबर पेन होते ही हेलिकॉप्टर भेजकर उठवा लेंगे!” अब जनता आज भी गड्ढों में खड़ी होकर आसमान की तरफ टकटकी लगाए देख रही है कि सड़क न सही, शायद ऊपर से कोई उड़न खटोला ही आ जाए!

पोषण आहार का ‘साउथ इंडियन’ तड़का!

आंगनबाड़ियों में बटने वाले पोषण आहार में आजकल एक नया स्वाद आ गया है कर्नाटक फ्लेवर! जी हां मध्य प्रदेश के 85 लाख बच्चों और गर्भवती महिलाओं की थाली में क्या परोसा जाएगा, इसका रिमोट कंट्रोल अब सीधे दक्षिण भारत की तरफ घूमता दिख रहा है। कहते हैं कि जब से महिला एवं बाल विकास विभाग के हेड ऑफिस में कर्नाटक वाले अफसरों की एंट्री हुई है, तब से नियमों की फाइलें भी मसाला डोसा की तरह बड़ी तेज़ी से पलटी जा रही हैं! सबसे मजेदार मोड़ तो इस कहानी में यह आया है कि 1200 करोड़ का पहला बजट किसी महिला स्व-सहायता समूह के हिस्से नहीं, बल्कि दक्षिण की एक बड़ी प्राइवेट कंपनी की झोली में डालने की तैयारी चल रही है। मतलब स्थानीय महिलाओं को बोला जा रहा है “दीदी जी, आप जरा साइड हो जाइए, अब कॉरपोरेट वाले बाबू लोग हलवा बांटेंगे!” पर सबसे बड़ा ट्विस्ट जानते हैं क्या है? जिस कर्नाटक का नाम लेकर यह पूरा मॉडल तैयार किया जा रहा है, खुद उस कर्नाटक में भी पोषण आहार बांटने का काम महिला स्व-सहायता समूह ही संभालती हैं! यानी कर्नाटक में दीदी पावर सुपरहिट है, लेकिन मध्य प्रदेश में उसी मॉडल के नाम पर प्राइवेट कंपनी की एंट्री कराई जा रही है। वाह साहब! इसे कहते हैं “नाम दक्षिण का, काम अपना!” फिलहाल तो यह सिर्फ अफसरों के कमरों में पक रही खिचड़ी की चर्चा है। लेकिन अगर विभाग ने सच में इस साउथ इंडियन स्क्रिप्ट पर मुहर लगा दी, तो मध्य प्रदेश की स्व-सहायता समूह वाली दीदियां ऐसा साउथ स्टाइल एक्शन और विरोध का तांडव दिखाएंगी कि बड़े-बड़े अफसरों का न्यूट्रिशन गोल हो जाएगा!

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‘खतरों के खिलाड़ी: भोपाल दफ्तर एडिशन’!

पूरे शहर की टूटी-फूटी इमारतों पर लाल रंग का नोटिस चस्पा करने वाली हमारी शहर की सरकार इन दिनों खुद अपने ही दफ्तर में एडवेंचर स्पोर्ट्स का मजा ले रही है! भोपाल के जिस अनुरक्षण खंड पर पूरे शहर के रखरखाव की जिम्मेदारी है, उसकी हालत देखकर हंसना है या रोना… यह तय करने में ही आपका आधा दिन निकल जाएगा। जो विभाग पूरे भोपाल के गड्ढे और प्लास्टर भरने का दावा करता है वो अपना खुद का प्लास्टर नहीं संभाल पा रहा! दफ्तर की दीवारों से चूना और सीमेंट ऐसे उखड़ रहा है मानो दीवार ने खुद ही हाथ खड़े करके कह दिया हो “बस भाई, अब मुझसे और नहीं झेला जाता!” ऊपर से दीवारों पर सीलन और काई ने ऐसा नेचुरल वॉलपेपर बना रखा है जिसे देखकर देश के बड़े-बड़े इंटीरियर डिजाइनर भी सोच में पड़ जाएं कि भाई… यह कौन सा नया इको-फ्रेंडली आर्ट फॉर्म है! दफ्तर में बैठे कर्मचारियों का हाल तो पूछिए ही मत! बेचारों का काम क्लैरिकल कम और स्टंट ज्यादा लगता है। एक हाथ से फाइल पर दस्तखत कर रहे होते हैं और दूसरी आंख सीधे छत पर टिकी रहती है कि पता नहीं कब प्लास्टर की एक सप्राइज पपड़ी सीधे सर पर या फाइल पर लैंड कर जाए! रही-सही कसर बिजली के तारों ने पूरी कर दी है। छत से लटकते तारों का ऐसा ‘स्पाइडर-मैन जाल’ बिछा हुआ है कि लगता है कर्मचारी काम करने नहीं, बल्कि खतरों के खिलाड़ी का कोई एलिमिनेशन टास्क पूरा करने आए हैं! अब तो बेचारे कर्मचारी रोज दफ्तर का दरवाजा खोलते ही हाथ जोड़कर बस एक ही दुआ मांगते हैं “हे प्रभु! आज फाइल का टारगेट भी पूरा हो जाए… और हमारी खोपड़ी और छत भी सलामत रहे!” सवाल यह है कि शहर भर को जर्जर इमारतों का नोटिस बांटने वाले हुकमरानों की नजर अपने ही दफ्तर के इस डेडली जोन पर कब पड़ेगी? या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही फाइल आगे खिसकेगी?

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