राकेश चतुर्वेदी की कलम से
दस नंबरी 100 रसूखदारों को बचाने व्यापारियों को उकसाया
ये गॉसिप बहुत ही चुटीली है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने पर नगर निगम ने रहवासी इलाकों में व्यवसायिक गतिविधियां रोकने के लिए नहीं बल्कि 100 रसूखदारों को बचाने के लिए आम व्यापारियों को सड़क पर आने के लिए मजबूत किया था. अकेले नोटिस से बात नहीं बनी तो सीलिंग की कार्रवाई तक कर डाली. पूरी स्क्रिप्ट इस तरह लिखी गई कि शहर के आम व्यापारियों का आक्रोश सड़क पर भड़क उठे और उनकी आड] में दस नंबरी कलफदारों के ठिकानों को बचाया जा सके. दरअसल सुप्रीम कोर्ट में यह मामला 10 नंबर के ठिकानों को लेकर पहुंचा था. कोर्ट ने इन व्यवसायिक गतिविधियां को तुरंत बंद करने का आदेश दिया तो बंगलों पर बड़ी बैठकें हुईं. रास्ता निकाला गया कि एक्शन भी दिखे तो तय ठिकानों पर कोई रिएक्शन भी न हो. इसके लिए कार्रवाई चरणबद्ध और विधानसभावार बांटी गई. प्लानिंग के तहत सबसे अधिक पॉश व रहवासी इलाकों में शोरूम वाली मध्य विधानसभा में कार्रवाई के लिए पहले चरण में होटल, रेस्टोरेंट, जिम, शामिल कर लिए गए, लेकिन शोरूम शब्द पूरी तरह छोड़ दिया गया. फिर क्या शोरूम छोड़-छोड़कर तालाबंदी कर दी गई. सभी छह विधानसभाओं में नोटिस के बाद आंच सीलिंग तक पहुंची तो छोटे व्यापारियों का आक्रोश फूट पड़ा. सड़क पर मोर्चाबंदी हुई तो सरकार को हरकत में आना पड़ा और फिर निगम अफसरों के साथ दस नंबरी शोरूम संचालकों ने बैठक कर राहत की सांस ली. सबकी नजर अब 15 तारीख को होने वाली सुनवाई पर अटकी हुई हैं.
तीसरे माले पर वाइल्ड कार्ड एंट्री
मध्य प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल में लंबे समय से खाली पड़े पदों पर ताजपोशी की तैयारियां चल ही रही थीं कि अचानक तीसरे माले पर धमाके के साथ वाइल्ड कार्ड एंट्री ने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी. अचानक एक कैबिन में स्पेस तैयार हुआ और कुर्सियां जम गईं. खास बात यह कि एंट्री की चर्चाएं शुरू ही हुई थीं कि राज्य स्तर के नेताओं की इस केबिन में आवाजाही भी शुरू हो गई. मुलाकातों का सिलसिला अब सिर्फ भोपाल तक सीमित नहीं है, बल्कि दूरांचल के जिलों के सियासी समीकरण भी यहां चर्चा के प्रमुख बिंदू हैं. सूत्रों की मानें तो इन मुलाकातों में सिर्फ संगठन की औपचारिकताओं पर बात नहीं हो रही, बल्कि उन वजहों को भी खंगाला जा रहा है जिनके चलते जिलों में नेताओं के बीच दूरियां बढ़ीं. आखिर कहां चूक हुई, किस स्तर पर संवाद टूटा और किन चेहरों के बीच फिर से समन्वय की जरूरत है. खबर यह भी है कि इसी कैबिन से विधायकों और पूर्व विधायकों के बीच समन्वय का नया फॉर्मूला निकाला जाएगा. यानी तीसरे माले का यह नया ठिकाना सिर्फ एक कुर्सी और केबिन की कहानी नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में संगठन की अंदरूनी सियासत को साधने का सेंटर भी बन सकता है.
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ठीक तो चल रहा है, नियुक्ति के लिए इसलिए जल्दबाजी नहीं
मध्य प्रदेश बीजेपी में एक प्रमुख पद पर काबिज रहे पदाधिकारी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोशन देकर दिल्ली में बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी गई है. पद खाली हुआ तो दावेदारों की निगाहें स्वाभाविक तौर पर खाली कुर्सी पर टिकी ही हुई हैं. दावेदारों ने अपने-अपने स्तर पर प्रमुख केंद्रों तक सिफारिशें पहुंचाने का सिलसिला काफी पहले शुरू कर दिया था. ये दौर अभी भी जारी है. हाल ही में सिफारिश के लिए कुछ वजनदार लोग एक जगह जुटे. तय किया गया कि कुर्सी पर चर्चा कर नाम आगे बढ़ा ही देंगे. चर्चा छिड़ी तो सवाल पूछ लिया गया कि बराबरी वाले चेहरे कितने हैं? इस बीच दिल्ली गए नेताजी की वर्किंग स्टाइल भी बातचीत के केंद्र में आ गई. फिर क्या था बैठक तो पूरी सवा घंटे तक चली, लेकिन मंथन किसी नाम की सिफारिश किए बिना ही पूरा हो गया. बैठक में सबसे दिलचस्प बात आखिर में सामने आई. जाते-जाते नेताजी ने संकेत दिया कि अभी क्या सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. जब गाड़ी पटरी पर है, तो नियुक्ति के लिए हमें भी कोई जल्दबाजी नहीं है.
दतिया कार्यकारिणी में दादा की ही चलेगी
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात और ओरछा में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के साथ आई तस्वीरों के बाद से दादा के समर्थक पहले की तरह उत्साह में हैं. दादा दिल्ली से लौटे तो माई कृपा पर बड़ी संख्या में समर्थक मिलने पहुंचे. नजारा कुछ इस तरह था जैसे नई सियासत के बाद का पहला नगर प्रवेश हो. समर्थकों की अधिक संख्या को देखते हुए दादा भी लंबे समय तक उनके बीच बने रहे. दिल्ली और ओरछा की तस्वीरों को क्षेत्र में पुरानी सक्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है. मेल-मुलाकातों में चर्चा इस बात पर भी खास तौर पर हो रही है कि भंग होने के बाद फिर गठित होने जा रही जिला कार्यकारिणी में इस बार भी दादा की ही चलेगी.
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दिया तले अंधेरा… निजी अस्पतालों की खैर नहीं, सरकारी अस्पताल की खबर नहीं
राजधानी में निजी अस्पतालों की व्यवस्थाओं पर नकेल कसने के लिए बड़े साहब की कार्रवाई इन दिनों खूब चर्चा में है. लापरवाही दिखी नहीं कि नोटिस, जांच और कार्रवाई की तैयारी शुरू, लेकिन चर्चा यह भी है कि दिया तले ही अंधेरा हो तो रोशनी बाहर कैसे दिखेगी. राजधानी के सरकारी अस्पताल में ही एक्स-रे वाले साहब और दवा बाबू की कमी की चर्चा है. जगह-जगह अव्यवस्था और मरीज जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए परेशान बताए जा रहे हैं. सवाल यह उठ रहा है कि निजी अस्पतालों की कमियां तो बड़े साहब की नजर में तुरंत आ जाती हैं लेकिन सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाएं उनकी नजर से कैसे बच जाती हैं. कार्रवाई का डंडा निजी अस्पतालों पर और सरकारी अस्पताल में अव्यवस्था पर खामोशी आखिर यह कैसा सिस्टम है. निजी अस्पतालों के लिए चाबुक तैयार है तो सरकारी अस्पतालों के लिए आईना कब सामने आएगा. आखिर मरीज तो दोनों जगह इलाज के लिए ही जाता है. कहने वाले ठीक ही कहते हैं कि दिया तले अंधेरा हो तो सबसे पहले बाती ही बदलनी पड़ती है.
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