राकेश चतुर्वेदी की कलम से

दोनों मुखिया का बड़प्पन

तमाम विरोधाभाष की खबरों को चीरते हुए प्रदेश कार्यालय में पत्रकार-वार्ता हुई तो दोनों मुखिया के बड़प्पन की चर्चा दूर तक फैल गई. प्रेस कांन्फ्रेंस के दौरान प्रदेश अध्यक्ष बड़प्पन दिखाते हुए मेन कुर्सी छोड़ साइड की कुर्सी पर बैठने लगे तो सरकार के मुखिया ने भी हाथ बढ़ाकर बड़प्पन दिखाया. सरकार के मुखिया ने बड़ी ही विनम्रता के साथ पार्टी के अध्यक्ष को मेन कुर्सी पर बैठा दिया. इसके बाद अध्यक्ष ने खुद को सेंटर में पाया तो अध्यक्ष ने दोबारा बड़प्पन दिखाया और तीन कुर्सियों वाले मंच पर मुखिया की कुर्सी के बाद एक और कुर्सी लगवा दी. अब चार कुर्सियां हो जाने से सरकार के मुखिया और पार्टी के मुखिया की कुर्सी बीचों-बीच हो गईं और दोनों की ही कुर्सी मेन कुर्सी कहलाईं. एक-दूसरे के प्रति इस आदर भाव से पहले भी दोनों नेताओं का एक-दूसरे के प्रति बड़प्पन देखने को मिला. सरकार के मुखिया अपने निवास से पार्टी के मुखिया के निवास पहुंचे और वहां से दोनों नेता एक ही वाहन से पार्टी कार्यालय आए. इन तस्वीरों के बाद उन बातों पर पूरी तरह विराम लग गया, जिनमें बार-बार सत्ता और संगठन के बीच सब कुछ ठीक नहीं होने की बात पर बल दिया जा रहा था.

टोल से तीसरी आंख से पीछा, फिर होती है वसूली

मध्य प्रदेश में नेशनल हाइवे पर कैद हुए धाकड़ कांड के बाद अब चौंकाने वाले इनपुट सामने आए हैं. इनपुट ये हैं कि मोटी रकम वसूली के लिए प्रदेश के चुनिंदा टोल नाकों के पास बड़ा रैकेट संचालित हो रहा है. इन नाकों से लोकल सिटीजन्स के वाहनों पर नजर रखी जाती है और शक होते ही सीसीटीवी कैमरों के सहारे निगरानी होने लगती है. बुरी नियत से भटकते फिर रहे लोगों के वाहन कुछ किलोमीटर पर अटक ही जाते हैं और वाहन में लोगों ने हरकत की तो चेहरे तीसरी आंखों में कैद हो जाते हैं. रिकॉर्डिंग पूरी होते ही घटना के संबंध में मौके पर ही जाकर सब-कुछ बता दिया जाता है और इसी के साथ ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता है, जो जितना बड़ा खानदानी उससे उतनी ही अधिक रकम की डिमांड होती है. बड़ी बात ये है कि वसूली गई रकम का एक हिस्सा वाहनों को संदेह के घेरे में रखने वालों के हिस्से में भी जाता है.

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एक अस्पताल से करोड़ की डिमांड

पिछले दिनों मध्य प्रदेश के निजी अस्पतालों पर हुई कार्रवाई के बाद चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है. भोपाल संभाग के एक अस्पताल के सामने पूरे एक करोड़ रुपए की डिमांड रखी गई थी. शर्त थी डिमांड राशि पूरी करो और धड़ल्ले से अस्पताल संचालित करो. अस्पताल संचालक ने डिमांड से 10 प्रतिशत में तोड़-बट्टी करने का प्रयास किया, लेकिन 10, 20 तो क्या 25-30 प्रतिशत में भी बात नहीं बनी. फिर क्या था, शर्त मानने से साफ इनकार कर दिया गया और नाम कार्रवाई वाली अस्पतालों की लिस्ट में शामिल हो गया. भोपाल की तरह एक-दो अस्पताल संचालकों की ओर भी इसी तरह की डिमांड रखे जाने की खबरें सामने आ रही हैं, हालांकि वहां की डिमांड राशि काफी कम बताई जा रही है. इस बीच प्रदेश के डॉक्टर्स के बीच एक चर्चा बड़े जोरो पर है कि ऐसा नहीं है कि जिन अस्पतालों का लाइसेंस निरस्त हुआ है वहां शत प्रतिशत नियमों का पालन हो ही रहा था, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इतनी ही खामियां समेटे संचालित होने वाले सभी अस्पतालों के लाइसेंस निरस्त हो गए हों.

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करीब चार करोड़ का गबन… हिसाब-किताब किसके नाम

सैर सपाटा विभाग की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है साहब… यहां गड़बड़ियों का खेल चले तो घाटा विभाग का और जिम्मेदारी तय करने की बारी आए तो सबकी नजरें फाइलों पर टिक जाती हैं. अब करीब 3.91 करोड़ के कथित गबन का मामला सामने आया है. आरोप विभाग के मार्केटिंग शाखा में कार्यरत एक आउटसोर्स कर्मचारी पर लगा, थाने में रिपोर्ट भी हो गई, लेकिन खबरे यह है कि साहब फरार बताए जा रहे हैं. यानी सैर सपाटा में घूमने निकला पैसा, आरोपी भी निकला सैर पर और अब जिम्मेदारी भी शायद छुट्टी पर चली गई है. सवाल ये है कि इतने बड़े कथित गबन के बाद विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आखिर किस बात की जिम्मेदारी ले रहे हैं. FIR के आवेदन देकर पल्ला झाड़ना आसान है, लेकिन विभाग को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा. क्या इस करोड़ों के गबन की रकम भी अब जांच जारी है वाली फाइल में आराम फरमाएगी. सैर सपाटा विभाग पहले ही अपनी कथित गड़बड़ियों और घाटे को लेकर चर्चा में रहता है. जनता पूछ रही है आरोपी गिरफ्त से बाहर है, अधिकारी जिम्मेदारी से बाहर हैं तो फिर करीब 3.91 करोड़ की भरपाई आखिर किसके खाते में जाएगी.

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