राकेश चतुर्वेदी की कलम से

आम को आगे कर खास बना रहे दबाव…

राजधानी भोपाल के मास्टर प्लान की गड़बड़ियों के बीच कुछ खास लोग अपने हित साधने में जुटे हैं. मनमाफिक प्रावधान नहीं होने पर दो नेताओं ने आम लोगों के जरिए अपनी-अपनी अलग-अलग आपत्तियां लगवाई हैं. एक ने ग्रामीण क्षेत्रों की बसाहट वाली जमीन को प्रतिबंधित जोन में रखने पर विरोध दर्ज करवाया तो दूसरे ने 24 मीटर चौड़े मार्ग पर व्यावसायिक उपयोग के प्रावधान का हवाला देकर अपने निवेश वाले इलाके में भी कमर्शियल उपयोग की मांग क्षेत्रीय लोगों से उठवाई है. चर्चा है कि आपत्तियां लगवाने से पहले लोगों के साथ खास स्थानों पर बैठकें की गईं और उन्हें बताया गया कि क्या करना है और क्या नहीं. अब अफसरों को आपत्तियों के कागजात भेजकर यह कहकर दबाव बनाया जा रहा है कि जनता की सुनवाई तो करनी ही पड़ेगी. हालांकि अफसर भी भलीभांति जानते हैं कि इन मांगों के पीछे आम लोगों की जरूरतें हैं या खास लोगों के हित? मास्टर प्लान की खामियों में सुधार के नाम पर किस-किस को निवेश का फायदा होगा अफसरों से यह सब कुछ छुपा नहीं है.

हारे बैठे, लेकिन हैं मंत्रीजी

मालवा और बुंदेलखंड के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले इलाके में कभी मंत्रीजी की तूती बोलती थी. पंचायत से जिला मुख्यालय तक उन्हीं का एकतरफा सिक्का चलता था. 2023 में चुनाव हारे तो कुर्सी ही खिसक गई, लेकिन नेताजी के मिजाज से मंत्री पद जस का तस चिपका हुआ है. अफसर हों या कार्यकर्ता, रौब ऐसा कि मानो जिले से लेकर विभाग आज भी उन्हीं के हवाले हो. पार्टी के अपने विधायक तक खुलकर खिलाफ खड़े हैं, मगर नेताजी के तेवर हैं कि झुकने का नाम नहीं ले रहे. हार को ढाई साल से अधिक समय बीत गया, लेकिन नेताजी अब भी पुराने मंत्री वाले अंदाज में ही दरबार लगा रहे हैं. नेताजी के इस व्यवहार को देख अब कार्यकर्ता भी तंज कसने लगे हैं कि जनता ने मंत्री पद छीन लिया, लेकिन नेताजी ने उसका हैंगओवर नहीं छोड़ा है. लगता है कि चुनाव में हार सिर्फ वोटों के अंतर की हुई थी, नेताजी के हिसाब से सत्ता आज भी उन्हीं की है.

ये भी पढ़ें: पॉवर गॉसिप: राम-हनुमान भरोसे नैया डार दई… तस्वीरें और मायने अलग-अलग… सड़कें वाले मंत्री की ही नहीं सुन रहे… कैंटीन वाली थाली…

नेताजी की डीपी

मध्य प्रदेश के एक प्रमुख जिले में सत्ताधारी दल के नेताजी ने डीपी के चक्कर में ऐसा दांव चला कि मामला दो कॉलोनियों के बीच जा पहुंचा. चर्चा है कि कवर्ड कैंपस में मकान खरीदने के बाद नेताजी की नजर मकान और कॉलोनी की डीपी के बीच की जगह पर पड़ गई. पहले तो इस जगह पर धीरे-धीरे कब्जे की कहानी आगे बढ़ी, लेकिन जब इतने से भी बात नहीं बनी तो डीपी को ही पड़ोस की कॉलोनी में शिफ्ट कराने की तैयारी शुरू कर दी गई. अफसरों से चर्चा के बाद जब डीपी शिफ्टिंग का काम आगे बढ़ा तो दूसरी कॉलोनी के रहवासी संघ ने आपत्ति जता दी. नेताजी ने पहले अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रास्ता निकालने की कोशिश की, लेकिन मामला जब दोनों कॉलोनियों के स्वामित्व और अधिकारों तक पहुंचा तो तेवर कुछ ठंडे पड़ गए. अब चर्चा है कि डीपी शिफ्टिंग के रास्ते में अड़ंगा डालने वाले रहवासी संघ के पदाधिकारियों को देख लेने की धमकी तक दे दी गई है. कुल मिलाकर, नेताजी को अपने मकान के आसपास की जगह भी चाहिए और डीपी भी अपनी सहूलियत के हिसाब से. वैसे डीपी शिफ्टिंग का किस्सा अभी बाकी है. अब देखना यह है कि कॉलोनियों के नियम भारी पड़ते हैं या नेताजी का रसूख.

क्लब-रेस्टोरेंट में ठगी का पैसा

जी हां ईओडब्ल्यू की जांच रिपोर्ट अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है. दरअसल, जांच में यह यूटर्न तब आया जब एक करोड़ की रिश्वत मांगने के आरोप के बाद उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने दीपम रायचुरा को ओएसडी पद से हटा दिया. डिप्टी सीएम ने यह कार्रवाई तब की जब कथित तौर पर 930 करोड़ की ठगी के आरोपी मोहित गोगिया ने अपने बयान में रायचुरा को 1 करोड़ की रिश्वत देने का दावा किया. अब जांच का दायरा आगे बढ़ा तो जानकारी लग रही है कि पंजाब की जेल में बंद मोहित गोगिया करीब 200 लोगों से 930 करोड़ की ठगी का आरोपी है. उसने भोपाल के दुग्ध उत्पाद विक्रेता से भी साढ़े 13 करोड़ की ठगी की थी. ठगी की राशि भोपाल में ही क्लब और रेस्टोरेंट में लगाई गई थी. प्राथमिक जांच में राजधानी में आठ से नौ क्लब और रेस्टोरेंट में ठगी का पैसा ठिकाने लगाने की बात सामने आई है. जांच इस दिशा में भी आगे बढ़ रही है कि टीटी नगर की शराब दुकानों के जरिए इन क्लब में बिना लाइसेंस शराब की सप्लाई की जाती थी. अब जांच का फोकस सिर्फ ठगी की रकम कहां गई इस पर नहीं, बल्कि इस राशि से खड़े किए गए कारोबार और उससे जुड़े नेटवर्क पर भी है और सबसे बड़ी बात पूरे नेटवर्क में और किस-किस की क्या भूमिका रही?

ये भी पढ़ें: पॉवर गॉसिप: मंच पर उपस्थिति-अनुपस्थिति से सियासी तस्वीरें तय… मंत्री-पूर्व मंत्री की रस्साकस्सी से उलझी गांठ… नंबर बढ़ाने की कवायद और नाम छूट गया… दफ्तर बना ट्रांजिट पॉइंट…

पानी वाले ‘साहब’ का रुतबा ऐसा कि तबादले भी भूल गए रास्ता

बैतूल के मुलताई में पानी वाले विभाग के एक साहब की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. सरकारी नौकरी में लोग कुछ साल एक जगह बिताते हैं और फिर तबादले का इंतजार करते हैं लेकिन यहां तो कहानी ही कुछ अलग नजर आती है. बताया जा रहा है कि साहब को एक ही जगह रहते-रहते करीब एक दशक के आस पास का समय हो गए. अब इतने लंबे वक्त में तो कई लोगों की पोस्टिंग बदल जाती है. जिले बदल जाते हैं और कुर्सियों पर नए चेहरे भी आ जाते हैं, लेकिन मुलताई में साहब का रुतबा बरकरार बताया जा रहा है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि साहब ने मुलताई में ही छोटे साहब से बड़े साहब तक का सफर तय कर लिया. यानी नौकरी की शुरुआत से लेकर बड़े पद तक का सफर भी इसी ठिकाने पर. अब ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही कि आखिर मुलताई की मिट्टी में ऐसा क्या खास है कि साहब का यहां से मोह छूट ही नहीं रहा. क्या विभाग में तबादले के नियम साहब तक पहुंचते-पहुंचते रास्ता भूल जाते हैं या फिर साहब की कुर्सी का कनेक्शन कुछ ज्यादा ही मजबूत है. आखिर करीब एक दशक वक्त कोई छोटा-मोटा समय तो नहीं है. इस दौरान कई अफसर आए होंगे कई गए होंगे, सरकारें बदली होंगी और तबादलों की सूचियां भी निकली होंगी, मगर चर्चाओं के मुताबिक साहब का ठिकाना नहीं बदला. अब विभाग के गलियारों में सवाल तैर रहे हैं कि क्या साहब के लंबे कार्यकाल की कोई खास वजह है. क्या विभाग को उनकी सेवाओं की इतनी जरूरत है कि उन्हें दूसरी जगह भेजने का विचार ही नहीं आया.

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m