राकेश चतुर्वेदी की कलम से
दिल्ली के बुलावे ने बढ़ाई हलचल
वीकेंड के दो दिन का पूरा शेड्यूल तैयार था। मंत्रीजी को कार्यक्रमों में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करनी थी। आयोजकों ने भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन तभी फोन की घंटी बजी और देखते ही देखते सारे कार्यक्रम धड़ाधड़ निरस्त हो गए। आयोजक वजह पूछते, उससे पहले ही मंत्रीजी के कदम दिल्ली की ओर बढ़ चुके थे।
कुछ देर बाद खबर मिली कि मंत्रीजी दिल्ली जाने वाली फ्लाइट में सवार हैं। फिर क्या था, सियासी गलियारों में चर्चाओं की उड़ान मंत्री जी किनफ्लाइट से भी तेज हो गई। आयोजक कार्यक्रम रद्द होने की वजह तलाशते रह गए और सियासत के जानकार दिल्ली कूच के मायने निकालने में जुट गए। अब सवाल यह कि आखिर दिल्ली से ऐसा कौन-सा बुलावा आया कि पहले से तय कार्यक्रम भी इंतजार की सूची में चले गए? क्या कोई खास संदेश था, कोई जरूरी मुलाकात या फिर सियासी गणित में अचानक कुछ ऐसा जुड़-घट गया कि दिल्ली जाना ज्यादा जरूरी हो गया? फिलहाल वजह किसी की पकड़ में नहीं है, लेकिन अटकलों के अपने पंख हैं। मंत्रीजी दिल्ली पहुंच गए, चर्चाएं राजधानी से लेकर स्थानीय सियासी चौपालों तक पहुंच गईं। अब सबकी नजर इस पर है कि दिल्ली दरबार से लौटकर मंत्रीजी क्या बताते हैं और उससे भी दिलचस्प यह कि क्या बताते ही नहीं हैं। क्योंकि सियासत में कई बार दौरे से ज्यादा चर्चा उस वजह की होती है, जिसे सार्वजनिक करने से परहेज किया जाए।
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जिले के सारे पटवारी हो रहे थे सस्पेंड!
बात मध्य प्रदेश में पटवारियों की हड़ताल के दौरान की है। बैठक में प्रशासनिक मुखिया ने नाराजगी क्या जताई, एक जिले के कलेक्टर ने इसे कुछ जरूरत से ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। आव देखा न ताव, अगले ही दिन काम पर नहीं आने वाले सभी पटवारियों को सस्पेंड करने की तैयारी कर डाली। कलेक्टर के मौखिक आदेश होते ही कार्यालय में हड़कंप मच गया। सूचना पटवारियों तक पहुंची तो आदेश जारी होने से पहले ही कर्मचारियों के हाथ-पांव फूलने लगे। दिनभर आदेश तैयार करने की कवायद चलती रही, लेकिन शाम तक सस्पेंशन ऑर्डर टाइप नहीं हुए। कलेक्टर ने वजह पूछी तो कर्मचारियों ने अपनी तरफ से दलील रख दी कि एक दिन की मोहलत और दे दीजिए। कलेक्टर साहब भी मान गए. मगर इस शर्त पर कि अगले दिन दोपहर 12 बजे तक आदेश हर हाल में जारी हो जाने चाहिए। अब इधर कार्यालय में सस्पेंशन ऑर्डर की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी, उधर देर शाम अचानक घटनाक्रम ने पलटी मार दी। रात होने से पहले ही पटवारी संघ ने हड़ताल खत्म करने का ऐलान कर दिया।
अगली सुबह कर्मचारियों को इसकी खबर लगी तो उनकी जान में जान आई। आखिरकार, जिस आदेश को जारी करने की तैयारी में पूरा कार्यालय हलाकान था, उसे जारी करने की नौबत ही नहीं आई। यानी एक रात ने पूरे जिले के पटवारियों पर कार्रवाई बचा ली और कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों की मशक्कत भी।
पुलिस कप्तान मोबाइल वालों से खफा
मसला महाकौशल के एक जिले का है, जहां सिस्टम सुधारने से ज्यादा पुलिस कप्तान की नाराजगी मोबाइल वालों से रहती है। घटना हो जाए तो उसके कारणों की पड़ताल और समाधान बाद की बात है, कप्तान की पहली चिंता यह रहती है कि कहीं वाकया मोबाइल में कैद तो नहीं हो गया। अगर हो गया, तो फिर पूरी ताकत वीडियो को बाहर आने से पहले ही रोकने में झोंक दी जाती है। विडंबना देखिए, सिस्टम की खामियां दूर करने से पहले उन्हें कैमरे की नजर से बचाने की कवायद शुरू हो जाती है। अब छोटे कर्मचारी भी दबी जुबान में कहने लगे हैं कि मोबाइल की नजर से बचने के बजाय सिस्टम को इतना दुरुस्त करिए कि मोबाइल को कुछ गलत नजर ही न आए। कुल मिलाकर, साहब की चिंता घटना से ज्यादा उसके वायरल होने की है, क्योंकि घटना पर सवाल उठें तो जवाब देना पड़ेगा। अब घटनाएं होती रहें और वीडियो बाहर न आएं, कम से कम मध्यप्रदेश में तो इतनी अंधेरगर्दी नहीं है।
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दस साल से कुर्सी पर कुंडली
खास हवन के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के एक जिले में जन शिक्षक साहब की कुर्सी इन दिनों खूब चर्चा बटोर रही है। वजह भी खास है, क्योंकि साहब दो-चार साल नहीं, बल्कि पूरे एक दशक से एक ही कार्यालय में जमे हुए हैं। इस दौरान न जाने कितने बड़े साहब आए और चले गए, व्यवस्थाएं बदलीं, तबादलों की आंधियां चलीं, लेकिन साहब की कुर्सी पर कोई आंच नहीं आई। ऐसे सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जन शिक्षक साहब का तबादला क्यों नहीं होता? क्या विभाग के तबादला नियम इन पर लागू नहीं होते या फिर कुर्सी से जुड़े कुछ ऐसे समीकरण हैं, जो हर बार इनके पक्ष में बैठ जाते हैं। यहां तक कि विभाग में कई चेहरे बदले, लेकिन साहब की ऑफिस वाली पारी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। आखिर माजरा क्या है। चर्चा अब यह है कि दस साल तक एक ही कुर्सी पर टिके रहने का राज क्या है। यह प्रशासनिक जरूरत है, विभागीय छूट या फिर कोई ऐसा जुगाड़, जिसके आगे तबादलों की आंधी भी बेअसर साबित हो रही है।
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