शिवम मिश्रा, रायपुर। राजधानी रायपुर में पुलिस की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में सर्राफा कारोबारी कार्तिक गिरि के लग्जरी वाहनों के लंबे काफिले के आगे रायपुर पुलिस की सफेद स्कॉर्पियो चलती दिखाई दे रही है। काफिले में शामिल कुछ लोग चलती गाड़ियों की खिड़कियों से बाहर निकलकर स्टंट करते भी नजर आ रहे हैं।

इस वीडियो के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक निजी कारोबारी के काफिले को पुलिस की पायलटिंग किस आधार पर उपलब्ध कराई गई? क्या कारोबारी को कोई विशेष सुरक्षा खतरा था? क्या पुलिस विभाग ने बाकायदा सुरक्षा आकलन किया था? क्या इसके लिए सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति ली गई थी? या फिर पुलिस की गाड़ी किसी निजी आयोजन और रसूख के प्रदर्शन का हिस्सा बन गई थी?

पुलिस की गाड़ी किसके आदेश पर और किस उद्देश्य से तैनात थी?

पुलिस की गाड़ी और पुलिस बल का इस्तेमाल आमतौर पर कानून-व्यवस्था, वीआईपी सुरक्षा, आपातकालीन परिस्थितियों और अधिकृत सुरक्षा व्यवस्था के लिए किया जाता है। ऐसे में किसी निजी कारोबारी के काफिले के साथ पुलिस वाहन की मौजूदगी स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है।

विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित कारोबारी को किस श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है? यदि सुरक्षा उपलब्ध कराई गई थी तो उसका आधार क्या था? पुलिसकर्मियों की तैनाती किस अधिकारी के आदेश पर हुई? क्या इसके लिए कोई आधिकारिक आदेश जारी किया गया था? पुलिस वाहन को इस काफिले के साथ भेजने का उद्देश्य क्या था?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या पुलिस विभाग की ओर से इस तैनाती का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध है? यदि यह अधिकृत सुरक्षा व्यवस्था थी तो इसकी जानकारी सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है? और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं था तो सरकारी वाहन और पुलिसकर्मियों की मौजूदगी की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?

पुलिस की मौजूदगी में यातायात नियमों की अनदेखी कैसे होती रही?

वीडियो का दूसरा पहलू पुलिस की निगरानी और यातायात नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल उठाता है। काफिले में शामिल कुछ लोग चलती गाड़ियों की खिड़कियों से बाहर निकलते और स्टंट करते दिखाई दे रहे हैं। सार्वजनिक सड़क पर इस तरह की गतिविधियां दूसरे वाहन चालकों और राहगीरों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि जब काफिले के आगे पुलिस की गाड़ी चल रही थी, तब इन गतिविधियों पर रोक क्यों नहीं लगाई गई? क्या पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी केवल काफिले को रास्ता उपलब्ध कराना थी या यातायात नियमों का पालन सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी थी?

यदि पुलिसकर्मियों ने इन गतिविधियों को देखा था तो तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की गई? और यदि नहीं देखा तो काफिले के साथ पुलिस वाहन की तैनाती के दौरान निगरानी व्यवस्था कैसी थी?

सुरक्षा व्यवस्था या निजी रसूख का प्रदर्शन?

पुलिस की मौजूदगी का उद्देश्य किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा बढ़ाना या उसके निजी काफिले को विशेष पहचान दिलाना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक सुरक्षा खतरा है तो विभाग नियमानुसार सुरक्षा उपलब्ध करा सकता है। लेकिन ऐसी व्यवस्था का स्पष्ट आधार और जवाबदेही भी होनी चाहिए।

यहां सवाल किसी कारोबारी को सुरक्षा दिए जाने पर नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और उसके इस्तेमाल के तरीके पर है। क्या पुलिस विभाग के पास इस तैनाती का स्पष्ट रिकॉर्ड है? क्या सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुआ? क्या इस व्यवस्था की समीक्षा की गई?

आम नागरिक पर तत्काल कार्रवाई, रसूखदारों के मामले में इंतजार क्यों?

रायपुर में आम नागरिकों के खिलाफ यातायात नियमों के उल्लंघन पर चालान और कार्रवाई की जाती है। बिना हेलमेट, बिना सीट बेल्ट, गलत दिशा में वाहन चलाने और अन्य उल्लंघनों पर यातायात पुलिस लगातार अभियान चलाती है।

लेकिन जब किसी बड़े काफिले से जुड़े लोगों पर सार्वजनिक सड़क पर स्टंट करने के आरोपों से जुड़ा वीडियो सामने आता है और उसी काफिले के साथ पुलिस वाहन भी दिखाई देता है, तब कार्रवाई को लेकर सवाल उठना लाजिमी है।

क्या इस मामले में भी वीडियो के आधार पर जांच और नियमों के उल्लंघन करने वालों की पहचान की जाएगी? क्या संबंधित वाहन चालकों पर नियमानुसार कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी दूसरे मामलों की तरह केवल चर्चा तक सीमित रह जाएगा?

वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही भी जरूरी

इस पूरे मामले में रायपुर पुलिस कमिश्नरेट की भूमिका और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही भी महत्वपूर्ण है। पुलिस लाइन के आरआई की ओर से घटनाक्रम की जानकारी नहीं होने की बात सामने आने के बाद सवाल और गंभीर हो जाते हैं कि आखिर पुलिस वाहन की तैनाती की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंची?

यदि यह अधिकृत व्यवस्था थी तो इसकी जानकारी और आदेश का रिकॉर्ड कहां है? यदि अनधिकृत रूप से पुलिस वाहन का इस्तेमाल हुआ तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या विभाग इस पूरे घटनाक्रम की आंतरिक जांच कराएगा?

रायपुर पुलिस कमिश्नरेट को इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। पुलिस जनता की सुरक्षा और कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए है। उसकी मौजूदगी किसी निजी काफिले की शोभा बढ़ाने या यातायात नियमों की अनदेखी को मूकदर्शक बनकर देखने के लिए नहीं होनी चाहिए।

अब देखना यह है कि पुलिस कमिश्नरेट इस वीडियो को संज्ञान में लेकर निष्पक्ष जांच कराता है या फिर पुलिस की पायलटिंग, सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और यातायात नियमों के उल्लंघन से जुड़े ये सवाल जवाब के इंतजार में ही रह जाते हैं।

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