कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। EXCLUSIVE Special Story: आज देश वायु सेना दिवस मना रहा है, आसमान में भारतीय वायुसेना के शौर्य की गूंज है, लेकिन ग्वालियर में इसी गौरव की एक निशानी अपनी बदहाली पर खामोश है। ये वही जांबाज है जिसने कभी दुश्मन के लड़ाकू विमानों को आसमान में चुनौती दी थी। भारत की आत्मनिर्भर उड़ान का प्रतीक बना था, लेकिन आज अपने ही सम्मान के लिए इंतजार कर रहा है। ग्वालियर के चिड़ियाघर में खड़ा यह ‘सेबर विध्वंसक’ पूरी तरह मकड़जाल, धूल और सूखे पत्तों से घिरा है। हैरानी ये कि चिड़ियाघर में वन्य प्राणी सप्ताह के आयोजन में तमाम जिम्मेदार अधिकारी पहुंचे, लेकिन इस वीर विमान की सुध लेने वाला कोई नजर नहीं आया।

कैसा पड़ा नाम?

साल 1956…भारत अपनी ताकत के दम पर आसमान में इतिहास लिखने की तैयारी कर रहा था। इसी दौर में भारत में तैयार हुआ एक इंजन वाला लड़ाकू विमान HAL नेट… छोटा आकार, हल्का वजन और कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भरने की क्षमता इसकी खासियत थी। फिर आया 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध…भारतीय वायुसेना के इस छोटे से जांबाज ने पाकिस्तान के अमेरिकी सेबर जेट्स का मुकाबला किया और अपनी क्षमता से दुश्मन को चौंका दिया। यहीं से इसे मिला नाम ‘सेबर विध्वंसक’।

ग्वालियर के गांधी प्राणी उद्यान में स्थापित

1971 के बांग्लादेश युद्ध में भी इस विमान ने अपनी ताकत दिखाई। दुश्मन के सेबर जेट्स के खिलाफ इसके शौर्य ने भारतीय वायुसेना की ताकत और जज्बे को नई पहचान दी। समय बदला, नई पीढ़ी के लड़ाकू विमान वायुसेना में शामिल होते गए और आखिरकार 1985 में इस शूरवीर विमान को सेवा से सम्मानपूर्वक विदाई दी गई। लेकिन इसकी कहानी खत्म नहीं हुई। इस गौरवशाली इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए इस विमान को ग्वालियर के गांधी प्राणी उद्यान में स्थापित किया गया। उद्देश्य था लोग इस विमान को देखें, देश की सैन्य ताकत और भारतीय वायुसेना के शौर्य को जानें और बच्चों के भीतर देशभक्ति की भावना पैदा हो, लेकिन आज तस्वीर इसके बिल्कुल उलट है।

धूल खा रहा लड़ाकू विमान

एक तरफ देश वायु सेना दिवस पर अपने जांबाजों को सलाम कर रहा है और दूसरी तरफ ग्वालियर के चिड़ियाघर में खड़ा यह जांबाज खुद सम्मान का इंतजार कर रहा है। देखिए…मकड़जाल ने इसे घेर रखा है, धूल की परत जमा है…सूखे पत्ते आसपास बिखरे हैं, जिस लड़ाकू विमान ने कभी आसमान में दुश्मन को चुनौती दी थी, आज उसकी देखभाल की जिम्मेदारी ही सवालों के घेरे में नजर आ रही है।

उठे सवाल

सबसे बड़ा सवाल इसलिए भी है क्योंकि इसी चिड़ियाघर में वन्य प्राणी सप्ताह का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में नगर निगम के तमाम जिम्मेदार अधिकारी पहुंचे। व्यवस्थाओं का जायजा लिया गया, लेकिन उसी परिसर में खड़े भारतीय वायुसेना के इस ऐतिहासिक विमान तक शायद किसी की नजर नहीं पहुंची।

यह सिर्फ लोहे और अन्य मेटल से बना विमान नहीं है, यह उस दौर की याद है जब भारत ने अपने दम पर आसमान में अपनी ताकत दिखाई थी। यह भारतीय वायुसेना के शौर्य की निशानी है। यह आत्मनिर्भर भारत की शुरुआती उड़ान की कहानी है और आज वायु सेना दिवस पर सवाल सिर्फ इतना है कि क्या देश के लिए इतिहास रच चुके इस जांबाज को कम से कम आज सम्मान और सफाई नसीब होने तक का हक नहीं?

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