विकास कुमार, सहरसा। जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर से सुर्खियों और बड़े विवादों के घेरे में आ गई है। ताजा मामला सीधे सिविल सर्जन कार्यालय से जुड़ा हुआ है, जहां आउटसोर्सिंग एजेंसी उर्मिला प्राइवेट लिमिटेड के डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर समीर कुमार गुप्ता ने सिविल सर्जन डॉ. राज नारायण प्रसाद पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ित का सीधा आरोप है कि ऑफिस के भीतर उनके साथ न केवल बदसलूकी की गई, बल्कि उन्हें थप्पड़ भी मारा गया। इस सनसनीखेज आरोप के सामने आते ही स्थानीय स्वास्थ्य महकमे में भूचाल आ गया है और हर तरफ इसी घटना की चर्चा हो रही है।

​उपस्थिति फाइल और रजिस्टर मांगने पर बढ़ा विवाद

​घटना के पीछे की जो मुख्य वजह सामने आई है, वह डाटा एंट्री ऑपरेटरों की उपस्थिति और उससे जुड़ी फाइल पर हस्ताक्षर कराने से जुड़ी है। समीर कुमार गुप्ता नियमित कार्य के तहत ऑपरेटरों की हाजिरी से संबंधित फाइल लेकर सिविल सर्जन के पास पहुंचे थे। उनका कहना है कि जब वे रजिस्टर और फाइल पर दस्तखत कराने की प्रक्रिया में थे, तभी किसी बात को लेकर कहासुनी शुरू हो गई। बात इतनी बढ़ गई कि आरोप के मुताबिक सिविल सर्जन ने आपा खो दिया और उन्हें थप्पड़ जड़ दिया। इस तरह एक सरकारी कार्यालय के भीतर उच्च अधिकारी द्वारा इस तरह का कदम उठाया जाना अपने आप में बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

​सिविल सर्जन ने आरोपों को बताया निराधार

​इस पूरे मामले पर जब सिविल सर्जन डॉ. राज नारायण प्रसाद से उनका पक्ष जानना चाहा गया, तो उन्होंने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। सिविल सर्जन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन पर लगाए गए मारपीट और थप्पड़ मारने के सभी आरोप पूरी तरह से निराधार, मनगढ़ंत और बेबुनियाद हैं। उनके अनुसार, कार्यालय परिसर में न तो किसी प्रकार की धक्का-मुक्की हुई और न ही किसी कर्मी के साथ कोई मारपीट की गई। उनका कहना है कि यह उनकी छवि को धूमिल करने और बेवफा तूल देने की एक सोची-समझी साजिश है।

​अब तक कोई लिखित शिकायत नहीं

​इस पूरे हाई-प्रोफाइल ड्रामे के बीच एक खास बात यह भी सामने आई है कि अब तक इस मामले में किसी भी थाने या फिर विभाग के उच्च अधिकारियों के पास कोई औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। जब तक कोई लिखित आवेदन या शिकायत सामने नहीं आती, तब तक प्रशासनिक तौर पर कोई ठोस कदम उठाना मुश्किल होता है। हालांकि, मौखिक आरोपों और चर्चाओं के कारण स्वास्थ्य विभाग के भीतर सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या पीड़ित कर्मी आगे आकर लिखित शिकायत देता है और स्वास्थ्य विभाग इस आंतरिक विवाद पर क्या एक्शन लेता है।