संभल. संभल में बुधवार (8 अक्टूबर) को 74 वर्षीय रामबेटी देवी की अंतिम यात्रा ने हर किसी का ध्यान खींच लिया. रजपुरा क्षेत्र के ब्यौरा गांव से निकली करीब 15 किलोमीटर लंबी अंतिम यात्रा में महिला के दो पालतू हाथी परमा और मोहन भी शामिल हुए. दोनों हाथी अर्थी के पीछे गाजे-बाजे के साथ चलते रहे. महिला की अंतिम यात्रा में आसपास के 12 से अधिक गांवों से करीब 1,500 लोग पहुंचे. 100 से ज्यादा ट्रैक्टर और अन्य वाहन भी यात्रा में शामिल रहे.

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मां के लाडले थे परमा और मोहन

रामबेटी देवी के बेटों मनवीर और चरन सिंह ने बताया कि उनकी मां का दोनों हाथियों से गहरा लगाव था. परिवार के सदस्य की तरह उनकी देखभाल करने वाली मां की अंतिम यात्रा में हाथियों को शामिल करने का फैसला बेटों ने लिया. दोनों हाथी यात्रा में सबसे आगे चलते रहे.

15 किलोमीटर तक निकली अंतिम यात्रा

अंतिम यात्रा ब्यौरा गांव से शुरू होकर बराला कस्बे से होते हुए राजघाट गंगा तक पहुंची. यात्रा में श्रीकृष्ण और शिवजी की झांकी भी निकाली गई. बराला में हाथियों के साथ गुजर रही अंतिम यात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़क किनारे जमा हो गए. इस दौरान करीब 25 मिनट तक जाम की स्थिति भी बनी.

200 साल से परिवार पाल रहा हाथी

मनवीर के मुताबिक, उनके परिवार में 200 साल से अधिक समय से हाथी पालने की परंपरा है. उनके दादा करन सिंह के समय से हाथी परिवार का हिस्सा रहे हैं. वर्ष 2012 में पिता की मौत के बाद रामबेटी देवी ने दोनों हाथियों की देखभाल की. परिवार के पास फिलहाल परमा और मोहन नाम के दो हाथी हैं, जिनकी उम्र करीब 78 साल बताई गई है.

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मां की मौत के बाद उदास हैं दोनों हाथी

रामबेटी देवी को करीब आठ साल से शुगर की बीमारी थी. तबीयत बिगड़ने पर तीन दिन पहले उन्हें अलीगढ़ के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां बुधवार तड़के करीब चार बजे उनकी मौत हो गई. बेटे मनवीर ने बताया कि मां के निधन के बाद से परमा और मोहन गुमसुम हैं और खाना-पीना भी कम कर दिया है. उनका कहना है कि दोनों हाथियों की मां से गहरी आत्मीयता थी.