लखनऊ. उत्तर प्रदेश पुलिस अब यौन अपराधों की जांच और पुलिस दस्तावेजों में संवेदनशील और तथ्य आधारित भाषा का इस्तेमाल करेगी. डीजीपी राजीव कृष्णा ने एफआईआर से लेकर आरोप पत्र तक में पीड़िता के प्रति अपमानजनक, पूर्वाग्रहपूर्ण या चरित्र पर सवाल उठाने वाली भाषा के इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं. पुलिस अब ‘इज्जत लूट ली’, ‘बेचारी महिला’, ‘अबला’, ‘चरित्रहीन’ और ‘दरिंदा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर सकेगी.
इसे भी पढ़ें- रवि किशन का विपक्ष पर हमला, बोले- EVM आपके पिताजी लाए थे, हारते ही सवाल क्यों?
पीड़िता के कपड़े और जीवनशैली पर टिप्पणी नहीं
नई गाइडलाइन के मुताबिक एफआईआर, केस डायरी, पुलिस रिपोर्ट या आरोप पत्र में पीड़िता के कपड़ों, रहन-सहन, मित्रता, वैवाहिक स्थिति, सोशल मीडिया इस्तेमाल या पूर्व संबंधों को अपराध से जोड़कर नहीं लिखा जाएगा. पुलिस मुख्यालय के अनुसार ऐसी टिप्पणियां जांच को प्रभावित करने के साथ पीड़िता को दोषी ठहराने वाली मानसिकता को बढ़ावा देती हैं.
आरोपी को पहले से जानना सहमति का प्रमाण नहीं
डीजीपी ने स्पष्ट किया है कि शिकायत दर्ज कराने में देरी, पीड़िता द्वारा विरोध नहीं करना, शरीर पर चोट के निशान नहीं मिलना या आरोपी को पहले से जानना सहमति का प्रमाण नहीं माना जाएगा. विवेचक उपलब्ध साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर ही रिपोर्ट तैयार करेंगे.
बच्चों के मामलों में भाषा को लेकर विशेष निर्देश
बाल यौन अपराधों के मामलों में भी पुलिस को विशेष सावधानी बरतने को कहा गया है. बच्चों के लिए ‘बाल पीड़ित’ या ‘बाल उत्तरजीवी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाएगा. निर्देशों में कहा गया है कि बच्चों की सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं होती, इसलिए ‘सहमति से गई थी’ जैसी भाषा से बचना होगा.
इसे भी पढ़ें- यूपी में बाढ़ के बीच फिर बिगड़ा मौसम, 42 जिलों में बारिश का अलर्ट
‘इज्जत लूट ली’ की जगह ‘गरिमा का उल्लंघन’
पुलिस मुख्यालय ने उपयुक्त और अनुपयुक्त शब्दों की सूची भी जारी की है. ‘इज्जत लूट ली’ की जगह ‘शारीरिक स्वायत्तता एवं गरिमा का उल्लंघन’ और ‘वासना का शिकार’ की जगह ‘यौन हिंसा की पीड़िता’ जैसे शब्द इस्तेमाल करने को कहा गया है. इसी तरह आरोपी के लिए ‘दरिंदा’, ‘राक्षस’ या ‘वासनापरस्त’ की जगह ‘अभियुक्त’ या ‘आरोपित व्यक्ति’ लिखा जाएगा. पुलिस ने पीड़ित की पहचान गोपनीय रखने पर भी जोर दिया है.

