पंकज श्रीवास्तव, छपरा। सारण जिले के मकेर, पानापुर और परसा सहित अन्य बाढ़ प्रभावित इलाकों में पानी अब धीरे-धीरे कम होने लगा है। भले ही पानी गांवों से निकल गया हो, लेकिन खेत अब भी जलमग्न हैं और किसानों की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं। बाढ़ का पानी घटने के बाद अब पीड़ितों के सामने नई और गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
दिन तो जैसे-तैसे कट जाता है, लेकिन शाम ढलते ही अंधेरे के साथ लोगों का दिल बैठने लगता है। अधिकांश इलाकों में बिजली आपूर्ति पूरी तरह ठप है। ग्रामीण मोमबत्ती और ढिबरी जैसे वैकल्पिक साधनों से रोशनी का इंतजाम कर रहे हैं। अंधेरे के कारण सांप, बिच्छू और अन्य जहरीले कीड़े-मकोड़ों का खतरा काफी बढ़ गया है, जिससे महामारी फैलने की आशंका सता रही है।
आसमान में बादल और दोहरी परेशानी
ऊंचे स्थलों और स्कूलों में शरण लिए लोगों के लिए परेशानी दोहरी है। आसमान में बादल छाते ही बारिश का डर सताने लगता है, क्योंकि खुले में रहना मुश्किल हो जाएगा। इस साल जिले के आठ प्रखंड बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए। छपरा-मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 722) पर कई जगहों पर कमर भर पानी आ जाने से यह मार्ग कई दिनों तक बंद रहा। गंडक नदी के दबाव से कई स्थानों पर तटबंध टूट गए, जिससे सैकड़ों गांव जलमग्न हो गए।



प्रशासनिक राहत के बीच अब भी कटे हैं कई गांव
जिला प्रशासन द्वारा रेस्क्यू, कम्युनिटी किचन, मेडिकल कैंप और मवेशियों के चारे की व्यवस्था की गई है। डीएम वैभव श्रीवास्तव और एसएसपी रौशन कुमार लगातार क्षेत्रों में डटे हुए हैं। इसके बावजूद, तटबंध टूटने के कारण कई गांव आज भी टापू बने हुए हैं, जहां राहत सामग्री नहीं पहुंच सकी है। लोग छतों पर रहने को मजबूर हैं और सड़कों के किनारे टीवी, फ्रिज, गद्दे व कपड़े सुखा रहे हैं।
पीड़ितों का दर्द और मांगें
पीड़ितों का कहना है कि अगर समय रहते तटबंध के रिसाव को ठीक कर लिया जाता, तो यह नौबत न आती। ग्रामीणों ने मांग की है कि:
- बिजली और इंटरनेट सेवा तत्काल बहाल की जाए।
- जहरीले कीड़ों और महामारी से बचाव के लिए छिड़काव हो।
- क्षतिग्रस्त मकानों और चौपट फसलों का त्वरित सर्वे कराकर उचित मुआवजा दिया जाए।
- कट चुकी सड़कों की अविलंब मरम्मत कराई जाए ताकि आवागमन सुचारू हो सके।

