अजयारविंद नामदेव, शहडोल। छात्रावासों की चारदीवारी के भीतर अगर सबकुछ ठीक-ठाक है, तो फिर बेटियों और छात्राओं को अपनी बुनियादी मांगों को लेकर सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है? हॉस्टल की दीवारें लांघकर कई किलोमीटर पैदल चलने और सीधे कलेक्ट्रेट पहुंचकर कलेक्टर से मिलने की मजबूर करने वाली घटनाओं के बाद, अब आखिरकार जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारी नींद से जागे नजर आ रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों की पुनरावृत्ति रोकने और छात्राओं की समस्याओं का जायजा लेने के लिए अब कहीं औचक निरीक्षण का दौर चल रहा है, तो कहीं अधिकारियों द्वारा चॉकलेट और मिठाइयां बांटकर नवरात्रि का उत्साह मनाया जा रहा है। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर छात्राओं को अपनी मांगें मनवाने के लिए सड़कों पर उतरने की नौबत क्यों आ रही है?

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संभागीय उपायुक्त ने किया औचक निरीक्षण, सुनी समस्याएं

इसी क्रम में जनजातीय कार्य एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के संभागीय उपायुक्त जेपी यादव ने पांडवनगर स्थित पांच कन्या छात्रावासों का आकस्मिक निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने अनुसूचित जाति महाविद्यालयीन छात्रावास शहडोल, सीनियर कन्या छात्रावास सोहागपुर व शहडोल, अनुसूचित जनजाति सीनियर कन्या छात्रावास गंज और जनजातीय अंग्रेजी माध्यम कन्या आश्रम की छात्राओं से सीधे संवाद कर उनकी समस्याएं जानीं।

निरीक्षण के दौरान उपायुक्त ने छात्राओं को अपनी क्षमताएं पहचानने, उपलब्ध अवसरों का सदुपयोग करने और लक्ष्य हासिल करने के लिए निरंतर प्रयास करने की सीख दी। उन्होंने मशहूर कविता ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ सुनाकर छात्राओं का हौसला बढ़ाया। साथ ही, उन्हें मोबाइल की लत से बचने, समय का सदुपयोग करने और आत्म-अनुशासन अपनाने की सलाह दी। छात्राओं द्वारा बताई गई समस्याओं को गंभीरता से सूचीबद्ध करते हुए उन्होंने संबंधित अधीक्षकों को एक सप्ताह के भीतर उनका प्रभावी निराकरण करने के कड़े निर्देश दिए हैं।

मिठाइयां बांटकर बढ़ाया हौसला

उधर, नवरात्रि के पावन अवसर पर सहायक आयुक्त आनंद राय सिन्हा एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय, शहडोल पहुँचे। उन्होंने वहाँ की छात्राओं से मुलाकात कर उनका कुशलक्षेम जाना और उन्हें चॉकलेट व मिठाइयां वितरित कर उनका उत्साहवर्धन किया। अधिकारियों के हाथों मिठाइयां पाकर छात्राओं के चेहरे खिल उठे।

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अधिकारियों का इस तरह छात्राओं के बीच पहुंचना और उनकी समस्याएं सुनना निःसंदेह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन असली चुनौती इन समस्याओं का स्थायी समाधान सुनिश्चित करना है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि तय किए गए एक सप्ताह के भीतर कितनी शिकायतें दूर होती हैं और छात्रावासों की व्यवस्थाओं में जमीनी स्तर पर कितना सुधार आता है। आखिरकार, व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि देश का भविष्य गढ़ने वाली छात्राओं को अपनी बात मनवाने के लिए कभी हॉस्टल की दीवारें लांघकर सड़क पर न उतरना पड़े।

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