अजयारविंद नामदेव, शहडोल। सरकार बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए छात्रावास बनाती है, लाखों रुपये खर्च करती है, सुविधाओं के नाम पर बजट देती है, लेकिन शहडोल में सवाल यह है कि अगर इन छात्रावासों में सबकुछ ठीक चल रहा है, तो फिर बच्चे आधी रात और तड़के सुबह हॉस्टल की दीवारें लांघकर सड़क पर उतरने को मजबूर क्यों हो रहे हैं। आखिर ऐसा क्या है कि दो महीने में पांच बार छात्र-छात्राओं को अपनी फरियाद लेकर कई किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्टर के दरवाजे तक पहुंचना पड़ा, क्या बच्चों की शिकायतें जिम्मेदारों तक नहीं पहुंच रहीं, या फिर उनकी आवाज छात्रावासों की चारदीवारी में ही दबकर रह जा रही है। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं के बाद अब जिला प्रशासन जागा है। 100 से अधिक अधिकारियों को निरीक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है, दो अधीक्षक निलंबित हुए हैं, दो पद से हटाए गए हैं और कई पर दूसरी कार्रवाई हुई है। लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है। क्या कार्रवाई से बदलेगी छात्रावासों की तस्वीर, या अपनी आवाज सुनाने के लिए बच्चों को आगे भी दीवारें लांघनी पड़ेंगी…
दरअसल, शहडोल जिले में पिछले दो महीनों के भीतर पांच बार आवासीय विद्यालयों के छात्र-छात्राओं के हॉस्टल से बाहर निकलकर अपनी समस्याओं को लेकर कलेक्टर से मिलने जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। कभी भोजन और जरूरी सुविधाओं को लेकर नाराजगी सामने आई, तो कभी पढ़ाई और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर विद्यार्थियों ने विरोध का रास्ता चुना, हाल ही में छात्राओं के कई किलोमीटर पैदल चलकर जिला मुख्यालय पहुंचने की घटनाओं ने भी प्रशासन का ध्यान खींचा…
100 से अधिक अधिकारियों के हाथ में छात्रावासों की निगरानी
लगातार सामने आ रही शिकायतों के बीच कलेक्टर पार्थ जायसवाल के निर्देश पर जिले में संचालित छात्रावासों का नियमित निरीक्षण कराया जा रहा है। इसके लिए जिला एवं उपखंड स्तर के 100 से अधिक अधिकारियों की ड्यूटी लगाई गई है। निरीक्षण में भोजन, शुद्ध पेयजल, साफ-सफाई, बिजली, बिस्तर, स्वास्थ्य परीक्षण, खेलकूद, पठन-पाठन सामग्री और भवनों की स्थिति से लेकर अधीक्षकों के व्यवहार तक की जांच की जा रही है।
दो अधीक्षक निलंबित, दो पद से पृथक
प्रशासनिक समीक्षा के बाद लापरवाही और अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई भी की गई है। दो छात्रावास अधीक्षकों को निलंबित किया गया, जबकि दो को पद से पृथक किया गया है। तीन अधीक्षकों की वेतन वृद्धि रोकी गई और सात को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।
50 हजार रुपये के अनुदान के उपयोग के निर्देश
छात्रावास भवनों की मरम्मत, पुताई और रखरखाव के लिए अधीक्षकों को प्रतिवर्ष मिलने वाले 50 हजार रुपये के अनुदान का उपयोग करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अब सवाल सिर्फ निरीक्षण और कार्रवाई का नहीं, बल्कि व्यवस्था में स्थायी सुधार का है। 100 से अधिक अधिकारियों की निगरानी और कार्रवाई के बाद क्या छात्रावासों की तस्वीर बदलेगी, क्या विद्यार्थियों को अपनी बात सुनाने के लिए फिर दीवारें लांघकर सड़क पर उतरना पड़ेगा, या उनकी समस्याओं का समाधान हॉस्टल के भीतर ही हो सकेगा.
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