सुरेश पाण्डेय, सिंगरौली। मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में स्थित जिला अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर में मरीजों की जिंदगी पर हर वक्त एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यहाँ करीब 400 बेड का अत्याधुनिक अस्पताल बनकर तो तैयार हो चुका है, लेकिन मरीजों की सुरक्षा के लिए सबसे अहम मानी जाने वाली ‘फायर सेफ्टी’ आज भी पूरी तरह नदारद है। हैरानी की बात यह है कि अस्पताल में सुरक्षा इंतजामों के लिए करीब 60 लाख रुपये का टेंडर भी जारी हुआ था, लेकिन इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था आज भी कागजों और फाइलों तक ही सीमित है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अस्पताल में भर्ती होने वाले सैकड़ों मरीजों की जान की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
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दो साल पहले हुआ था टेंडर, पुरानी और जंग लगी पाइप लगाने का आरोप
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस अस्पताल में फायर सेफ्टी सिस्टम लगाने के लिए करीब दो साल पहले भोपाल स्तर से टेंडर जारी किया गया था। यह टेंडर छत्तीसगढ़ की ‘वीनस इंफ्रास्ट्रक्चर’ नामक कंपनी को मिला था। लगभग 60 लाख रुपये की लागत वाले इस महत्वपूर्ण कार्य के तहत ठेकेदार द्वारा काम तो शुरू किया गया, लेकिन आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर पुरानी और जंग लगी पाइपें लगा दी गईं और बीच में ही काम अधूरा छोड़कर फरार हो गए।
सिविल सर्जन ने भी स्वीकार की अधूरी व्यवस्था
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खुद जिला अस्पताल की सिविल सर्जन डॉ. कल्पना रवि ने फायर सेफ्टी की व्यवस्थाएंूरी होने की बात खुलकर स्वीकार की है। उनका कहना है कि इस गंभीर समस्या और सुरक्षा में लापरवाही को लेकर जिला प्रशासन व संबंधित विभागों को कई बार पत्र लिखकर अवगत कराया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद अब तक समस्या का कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
क्या प्रशासन किसी बड़े अग्निकांड का इंतजार कर रहा है?
अब सवाल सीधे तौर पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़े होते हैं कि 60 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट और टेंडर पास होने के बाद भी फायर सेफ्टी का काम आज तक पूरा क्यों नहीं किया गया? घटिया काम करने और लापरवाही बरतने वाली संबंधित निर्माण कंपनी पर अब तक कोई कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? 400 बेड वाले इस बड़े अस्पताल में यदि ईश्वर न करे कोई अनहोनी या आगजनी की घटना हो जाए, तो सैकड़ों मरीजों को सुरक्षित बाहर निकालने की जिम्मेदारी किसकी होगी?
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यह स्थिति साफ दर्शाती है कि केवल कागजी निरीक्षण और झूठे दावों से काम नहीं चलने वाला है; जमीन पर उतरकर पुख्ता सुरक्षा इंतजाम करने होंगे, तभी मरीजों की जान सुरक्षित रह सकेगी। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कब तक संज्ञान लेते हुए लापरवाहों पर शिकंजा कसता है।
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