जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥
रामचरित मानस की एक चौपाई के इस अंश में भगवान श्रीराम अयोध्यावासियों से कहते हैं कि हे पुरवासियों यदि मेरे मुँह से कभी कोई नीति के विरुद्ध (अनुचित) बात निकले तो आप लोग निःसंकोच होकर मुझे रोक देना। ऐसे ही अपने आप को जनता की कसौटी में कसने का साहस एक आत्मविश्वासी नेतृत्व की पहचान होती है। लोकतंत्र में सरकार की सफलता का वास्तविक पैमाना आम नागरिक के जीवन में आने वाला सकारात्मक बदलाव होता है न कि घोषणाओं, बैठकों और योजनाओं की संख्या। जनता की शिकायत सुनी जाए, उन्हें समय पर न्याय मिले, सरकारी दफ्तरों में उनको अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें और अधिकारी समस्याओं के समाधान के लिए आगे आएं, यही होती है सुशासन की असली पहचान है।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के दौरान बिना पूर्व सूचना किसी भी जिले में पहुंचकर कामकाज का वास्तविक जायजा लेने का निर्णय सुशासन की कसौटी बनने जा रही है। राज्य सरकार की यह पहल प्रशासन को संदेश देती है कि जनता की समस्याओं का समाधान केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखाई देनी चाहिए।

रामचरितमानस की चौपाई जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥ इसका अर्थ है जिस शासक के राज्य में प्रजा दुखी रहती है उसका शासन आदर्श नहीं माना जा सकता। क्योंकि जनकल्याण ही शासन की नैतिक कसौटी है।
मुख्यमंत्री ने कलेक्टर-कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक और आईजी स्तर के अधिकारियों की समीक्षा बैठक में यह स्पष्ट कर दिया है कि जन विश्वास अभियान सरकार की प्राथमिकता है और अधिकारियों को फील्ड में रहकर अधिकतम समस्याओं का मौके पर ही निराकरण करने की बाध्यता होगी। मुख्यमंत्री का यह सख़्त रुख सराहनीय है। प्रशासनिक व्यवस्था में जब शीर्ष नेतृत्व स्वयं जवाबदेही सुनिश्चित करने की पहल करता है, तब कहीं जाकर निचले स्तर तक कार्यसंस्कृति में सुधार की संभावना बढ़ती है। आकस्मिक निरीक्षण हमेशा से अधिकारियों को सक्रिय रखने का प्रभावी माध्यम साबित हुआ है। इस अभियान का उद्देश्य भी केवल कमियां पकड़ना नहीं बल्कि व्यवस्था को स्थायी रूप से बेहतर बनाना भी है।

आज के समय में मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान इसलिए भी प्रासंगिक हो गया है क्योंकि सीएम हेल्पलाइन में राजस्व, महिला एवं बाल विकास, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जैसे विभागों में बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित बताई गई हैं। यह सभी वे विभाग हैं जिनका सीधा संबंध आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से है। जमीन का विवाद हो, राशन की समस्या, महिला एवं बच्चों के अधिकारों का प्रश्न या स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, इनमें देरी का अर्थ केवल प्रशासनिक विलंब नहीं बल्कि किसी परिवार की परेशानी बढ़ जाना भी है।
मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल द्वारा कुछ जिलों में अभियान के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखने पर नाराजगी जताना भी इस बात की ओर इशारा है कि सरकारी निर्देश और जमीनी क्रियान्वयन के बीच अभी फ़ासला बाक़ी है। इस फ़ासले को ख़त्म करना मोहन सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। शिकायतों को केवल निस्तारित दिखा देना इस अभियान के बाद अब पर्याप्त नहीं होगा। समाधान की गुणवत्ता, शिकायतकर्ता की संतुष्टि और समस्या के दोबारा उत्पन्न न होने की स्थिति की भी विधिवत जांच होगी। अगर ऐसा नहीं किया गया तो आंकड़ों में सुधार के बावजूद जनविश्वास कमजोर रह सकता है।
स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन-2026 योजना के अंतर्गत पात्र हितग्राहियों को नि:शुल्क रजिस्ट्री उपलब्ध कराने का शासकीय प्रयास ग्रामीण और शहरी नागरिकों के संपत्ति संबंधी अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम हो सकता है। 21 अक्टूबर 2026 तक 49,48,980 प्लॉट की नि:शुल्क रजिस्ट्री के निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले 1,60,230 रजिस्ट्रियां पूरी होने की जानकारी दी गई है। योजना का उद्देश्य तो सराहनीय है लेकिन आंकड़े एक दूसरी तस्वीर भी सामने रखने वाले हैं। निर्धारित लक्ष्य का मात्र 3.24 प्रतिशत ही पूरा हुआ है। इतने बड़े अंतर को देखते हुए प्रक्रिया की गति, दस्तावेजों की उपलब्धता, पात्र हितग्राहियों की पहचान और स्थानीय स्तर की बाधाओं की समीक्षा आवश्यक है। रीवा, शहडोल और धार में शून्य प्रगति वाले क्षेत्रों पर मुख्यमंत्री की सख्ती तथा बेहतर प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों और पटवारियों की प्रशंसा जवाबदेही और प्रोत्साहन के संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है। अब जरूरी है कि इस सख्ती का परिणाम तेजी से बढ़ती रजिस्ट्री और वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच के रूप में दिखाई दे।

मध्य प्रदेश में सामान्य 949 मिलीमीटर वर्षा के मुकाबले इस वर्ष 908.4 मिलीमीटर वास्तविक वर्षा दर्ज होने और 12 जिलों में सामान्य से 19 प्रतिशत से अधिक कम वर्षा की जानकारी गंभीरता से लेने योग्य है। धार, आलीराजपुर, झाबुआ, नर्मदापुरम, रतलाम, हरदा, बैतूल, उज्जैन, इंदौर, पांढुर्णा, शाजापुर और छिंदवाड़ा जैसे जिलों में खेती-किसानी, पेयजल और सिंचाई की जरूरतों के लिए विशेष कार्ययोजना बनाने के मुख्यमंत्री के निर्देश समयानुकूल हैं।
यह सच्चाई है कि औसत वर्षा का आंकड़ा किसी जिले के हर गांव की वास्तविक स्थिति नहीं बता सकता। कहीं जलस्रोत पर्याप्त हो सकते हैं और कहीं कम बारिश का असर फसलों और पेयजल पर गंभीर रूप से हो सकता है। पंचायत स्तर पर जल उपलब्धता, फसल की स्थिति, सिंचाई के साधनों और किसानों की जरूरतों का आकलन करके राहत और वैकल्पिक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने की योजना एक दानिशमंद क़दम है।संकट आने से पहले ही बचाव की दिशा में कदम उठाना बाद में पैदा होने वाली परेशानी से निपटने की तुलना में अधिक प्रभावी और किफायती होता है।
मौसम बदलने से होने वाली बीमारियों की पहचान और उपचार के लिए जिला अस्पतालों और शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में चेस्ट क्लीनिक शुरू करने की पहल स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक तत्पर बनाने वाली नज़र आ रही है। लेकिन इसके लिए ऐसा क्लीनिक खोलना पहला कदम है, जहां पर्याप्त चिकित्सक, जांच सुविधाएं, आवश्यक दवाएं और समय पर उपचार उपलब्ध हो। दीपावली से पहले क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत, अधूरे नगरीय निर्माण कार्यों को पूरा करने और दुर्घटना संभावित स्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश जो सीधे नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा से जुड़े हैं।मगर इन सभी कार्यों की सफलता समयसीमा के साथ गुणवत्ता की जांच पर भी निर्भर करेगी। जल्दबाजी में किए गए निर्माण जो अक्सर कुछ ही समय बाद फिर खराब हो जाते है इससे खर्च के बढ़ने के साथ ही जनता का भरोसा भी प्रभावित होगा।

गोवर्धन पूजा पर 208 वृंदावन ग्रामों के पशुपालकों को गोपाल कृष्ण ग्राम पुरस्कार देने और अगले वर्ष इसे सभी विकासखंडों तक विस्तारित करने का मोहन सरकार का प्रस्ताव ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन और पारंपरिक जीवनमूल्यों को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से सकारात्मक है। मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर कृषि केंद्रित प्रदर्शनी का आयोजन, राज्य की कृषि क्षमता और ग्रामीण विकास की संभावनाओं को सामने लाने का एक अच्छा अवसर बन सकता है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पूरी निष्ठा से प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का प्रयास कर रहे हैं। बिना सूचना किसी जिले में पहुंचने की उनकी घोषणा अधिकारियों को यह याद दिलाती है कि शासन की प्राथमिकता फाइलों के निपटारे से अलग जनसेवा है। मगर स्मरण रहे सुशासन की स्थायी व्यवस्था महज़ मुख्यमंत्री के आकस्मिक दौरों पर निर्भर नहीं रह सकती। मुख्यमंत्री की मौजूदगी के बिना भी अधिकारी नियमित रूप से जनता से मिलें, शिकायतों का समयबद्ध समाधान करें और अपने काम का सार्वजनिक हिसाब दें तब ही इसे वास्तविक सुधार कहा जा सकता है। इस प्रशासनिक सुधार के लिए विभागवार लंबित शिकायतों की नियमित समीक्षा, समाधान की स्वतंत्र जांच, नागरिकों से फीडबैक और लापरवाही पर निष्पक्ष कार्रवाई आवश्यक है साथ ही, अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन, स्पष्ट जिम्मेदारियां और समयबद्ध निर्णय लेने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए।
तटस्थ दृष्टि से देखें तो मुख्यमंत्री के निर्देश और प्राथमिकताएं सकारात्मक हैं, लेकिन निर्देशों की घोषणा और उनके वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर ही इस अभियान की असली परीक्षा होगा। किसी जिले में निरीक्षण के दिन व्यवस्था चुस्त दिखाई देना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि व्यवस्था अगले दिन, अगले महीने और पूरे वर्ष भी उतनी ही संवेदनशील बनी रहे।

लोकतंत्र में जनता योजनाओं की लाभार्थी होने के साथ शासन की सबसे महत्वपूर्ण हितधारक है। मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान को यदि सफलता पूर्वक शिकायत निपटाने के नियमित, पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र में बदला जा तो यह मध्यप्रदेश में प्रशासनिक संस्कृति के परिवर्तन का आधार बन सकता है।
धरातल की कठोर सच्चाई यह है कि जनविश्वास भाषणों से नहीं, अनुभव से अर्जित होता है। जब किसान को समय पर सहायता मिले, महिला को सरकारी योजना का लाभ बिना बाधा प्राप्त हो, मरीज को सुलभ उपचार मिले और नागरिक की शिकायत का समाधान उसकी संतुष्टि के साथ हो तभी सिद्ध होती है सरकार की संवेदनशीलता।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने अवसर और चुनौती दोनों बड़ी हैं। आकस्मिक निरीक्षण इस दिशा में एक प्रभावी और शानदार शुरुआत हो सकते हैं। अब सभी की पारखी नज़र इस पर रहेगी कि क्या यह पहल सरकारी मशीनरी को वास्तव में जवाबदेह अनाएगी है और क्या आम नागरिक को शासन में अपना विश्वास मजबूत होता हुआ महसूस होगा? क्योंकि जनता का विश्वास ही सरकार की सबसे बड़ी धरोहर है और उस विश्वास की रक्षा करना ही सुशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और कसौटी।
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥ आचार्य चाणक्य द्वारा रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के इस श्लोक में वर्णित प्रासंगिक विचार ऐसे हैं कि ‘राजा का सुख प्रजा के सुख में और उसका हित प्रजा के हित में निहित है इसलिए शासक को अपने निजी सुख के बजाय जनता के कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए।
संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m

