“बरनाश्रम निज-निज धरम निरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि, नहि भय शोक न रोग॥”

विषय से प्रासंगिक रामचरितमानस की इस चौपाई का अभिप्रायहै समाज के सभी लोग अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सुखी रहते हैं, उन्हें भय, शोक या रोग नहीं होता। इसी व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए मध्यप्रदेश की मोहन सरकार के उठाए जाने वाले कदमों की हर तरफ़ प्रशंसा हो रही है। सच्चाई यह है कि समय सीमा के साथ जुड़ी ज़िम्मेदारियाँ ही शासकीय नीतियों को कागज़ से जमीन पर उतारने का माद्दा रखती हैं। मध्यप्रदेश की मोहन सरकार के  द्वारा 45 महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित बैठक विकास की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होने वाला है। यह सामान्य समीक्षा ही प्रशासनिक सोच में परिवर्तन का संकेत भी होगा। शासकीय ‘काम हुआ है या नहीं’ से ज़्यादा कारगर इस बात की समीक्षा करना है कि ‘काम कब तक और कैसे होगा?’

इस बैठक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल चिन्हित विषयों पर ही चर्चा होगी। इस बैठक में हर विभाग को अपनी प्रगति रिपोर्ट के साथ आगामी कार्ययोजना प्रस्तुत करनी होगी। यह व्यवस्था एक कोशिश होगी कि पारंपरिक ढीले प्रशासनिक ढाँचे को एक सख्त और परिणामोन्मुख प्रणाली में किस तरह से बदली जाए। मध्यप्रदेश सरकार के इस कदम से न केवल विभागों की जवाबदेही तय होगी बल्कि  जनता को भी योजनाओं के धरातल पर उतरने का भरोसा मिलेगा।

यदि हम बैठक के इन 45 मुद्दों पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि सरकार ने जन- जीवन के हर पहलू को छूने का प्रयास किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में निशुल्क जमीन रजिस्ट्री और “स्वामित्व योजना” का विस्तार , प्रशासनिक सुधार के साथ ही साथ  सामाजिक सशक्तिकरण भी है। महिलाओं के नाम पर रजिस्ट्री को बढ़ावा देकर उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा देना एक बड़ा कदम है। डॉ.मोहन सरकार का यह निर्णय ग्रामीण भारत की उस तस्वीर को बदल सकता है जिसमें महिलाएँ संपत्ति के अधिकार से अक्सर वंचित रही हैं।

इसी प्रकार प्रदेश के पेयजल संकट पर गंभीरता से विचार करना भी समय की मांग है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी के कारण पानी का संकट भविष्य की बड़ी चुनौती बन सकती  है। ऐसे में ग्राम पंचायत से लेकर महानगरों तक जल प्रबंधन की एकीकृत नीति बनाना राज्य सरकार के दूरदर्शिता का परिचायक है। यदि पेयजल संकट पर समयबद्ध कार्ययोजना लागू होती है तो यह वर्तमान समस्याओं का समाधान के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी राहत का आधार बनेगी।

महिलाओं के सशक्तिकरण को “लाड़ली बहना योजना” के माध्यम से बलवती करने वाली सरकार ने इस योजना को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नही रखा बल्कि उसे रोजगार, प्रशिक्षण और बैंकिंग से जोड़ने की दूरदर्शी पहल भी की है। राज्य के मोहन सरकार का मत है कि आज के समय में केवल अनुदान देना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि हितग्राहियों को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाना अधिक महत्वपूर्ण है।यदि मध्यप्रदेश का यह मॉडल सफल होता है तो  सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के लिए यह एक नया मानक स्थापित कर सकता है।

अग्निवीरों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने का प्रस्ताव युवाओं के मनोबल को बढ़ाने वाला एक शानदार कदम है। इससे सेना में सेवा देने वाले युवाओं को भविष्य की सुरक्षा का भरोसा तो मिलेगा ही साथ ही उनकी देशभक्ति की भावना को भी मजबूती मिलेगी। मोहन सरकार का यह  निर्णय रोजगार और राष्ट्र निर्माण से जुड़ा हुआ विषय है।

आईटी सेक्टर, डीप टेक पार्क, डेटा सेंटर और ग्लोबल इन्वेस्टर समिट जैसे प्रस्ताव  इशारा करते हैं  कि सरकार परंपरागत विकास के साथ आधुनिक अर्थव्यवस्था की दिशा में भी तेजी से कदम बढ़ा रही है। राज्य की मोहन सरकार इस बात को लेकर चैतन्य है कि आज का युग तकनीक और नवाचार का है और जो राज्य इस दिशा में आगे बढ़ेगा वही भविष्य में आर्थिक रूप से सशक्त बनेगा।

मोहन सरकार के द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में लिए जाने वाले निर्णय भी काफ़ी महत्वपूर्ण हैं। अलग-अलग विभागों द्वारा संचालित स्कूलों को एकीकृत कर उसे शिक्षा विभाग के अधीन लाकर सरकार ने संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में सकारात्मक कदम उठाया है। राज्य में कैंसर अस्पतालों, IVF सेंटर और मेडिकल विश्वविद्यालयों को विस्तार देने  की योजना से स्वास्थ्य सेवाओं को नई ऊँचाई देने का प्रयास किया जा रहा है।

‘समय-सीमा और निगरानी’ इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि अक्सर योजनाएँ इसलिए विफल हो जाती हैं कि उनके क्रियान्वयन की समय-सीमा स्पष्ट नहीं होती। लेकिन इस बार तय हुआ है कि राज्य के मुख्यमंत्री स्वयं हर विषय की समयबद्ध समीक्षा करेंगे और प्रशासनिक ढिलाई की गुंजाइश को कम करेंगे। “गुड गवर्नेंस” की दिशा में उठाए जाने वाले इस सशक्त कदम में चुनौतियाँ भी कम नहीं होंगी। इतने बड़े स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन, विभागों के बीच समन्वय, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता और जमीनी स्तर पर पारदर्शिता सुनिश्चित करना एक श्रम साध्य काम होगा। इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक दक्षता की भरपूर ज़रूरत होगी।

“जहां सुमति तहां संपति नाना” इस पंक्ति को आधार बना कर उम्मीद की जा सकती है कि यदि निर्णय सही दिशा में प्रमाणिकता औऱ पारदर्शिता से लागू किए जाते हैं तो निश्चित ही मध्य प्रदेश विकास की नई ऊंचाइयों को छुएगा। लेकिन इसके उलट यदि यह केवल बैठकों और कागज़ी योजनाओं तक सीमित रह गया तो जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।

धनात्मक सोच के साथ कहा जा सकता है कि यह पहल केवल एक बैठक नहीं बल्कि शासन की कार्यशैली में बदलाव का वह संकेत है जो अवश्य सफल होगी और आने वाले एक वर्ष में प्रदेश की तस्वीर को बदल देगी। जनहित को सर्वोपरि मानकर लिए गए  सभी निर्णय सार्थक होंगे और उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगा। ऐसे निर्णय ही किसी सरकार के लिए असली कसौटी होती है और इस पर खरा उतरना ही इस पूरी कवायद की सफलता का पैमाना होता है।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक 
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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