”न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥”

इस प्रसिद्ध सुभाषित का भावार्थ है मुझे न तो राज्य (सत्ता या सिंहासन) की कामना है, न स्वर्ग के सुखों की अभिलाषा है और न ही मोक्ष ही चाहिए। मेरी एकमात्र यही कामना है कि दुःख से पीड़ित प्राणियों के कष्टों का नाश हो सके। किसी भी राजा या शासक के लिए यह एक आदर्श वाक्य होनी चाहिए। 


1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से पृथक होकर अस्तित्व में आने के बाद छत्तीसगढ़ आज अपनी विकास यात्रा के 26वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। उत्सव मनाने के अलावा यह अवसर अपनी उपलब्धियों का मूल्यांकन करने, कमियों को पहचानने और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर छत्तीसगढ़ बनाने का संकल्प लेने का भी है।एक समृद्ध राज्य होने के अलावा छत्तीसगढ़ की पहचान यहाँ की मेहनतकश जनता, समृद्ध संस्कृति, प्राकृतिक संपदा और आत्मीयता से भरी जीवनशैली भी है।

छत्तीसगढ़, अपनी ऐतिहासिक विरासत, पौराणिक मान्यताओं, प्राचीन मंदिरों, जनजातीय परंपराओं, हरे-भरे वनों, जलप्रपातों और खनिज संपदा के कारण देश ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित करने की क्षमता रखता है। बस्तर की लोककला, सिरपुर की ऐतिहासिक धरोहर, चित्रकोट का प्राकृतिक सौंदर्य और यहाँ की लोकभाषा, लोकगीत और लोकनृत्य हमारी अनमोल धरोहर हैं। आवश्यकता है कि हम इस विरासत को पर्यटन, रोजगार, शिक्षा और सांस्कृतिक पहचान के नए अवसरों में बदलें।

प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार के प्रयास और केंद्र सरकार का सहयोग छत्तीसगढ़ के विकास को नई गति देता हुआ दिखाई दे रहा है। डबल इंजन की सरकार से सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, उद्योग और जनकल्याणकारी योजनाओं में बेहतर समन्वय को लेकर आम-जन की अपेक्षाएँ स्वाभाविक है। केंद्र का सहयोग और राज्य सरकार की स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कार्ययोजना मिलकर विकास के नए रास्ते खोल सकती हैं। सरकार के प्रयासों की सराहना के साथ यह भी जरूरी है कि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, युवाओं को रोजगार मिले और ग्रामीण तथा आदिवासी क्षेत्रों में विकास का प्रकाश समान रूप से पहुँचे।

छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में शांति और सुरक्षा की बहाली से प्रगति की एक नई आशा जागती है। मगर, नक्सलवाद मुक्त छत्तीसगढ़ का सपना तभी साकार माना जाएगा जब सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विश्वास और सम्मान नक्सल प्रभावित सभी गांव तक पहुँचेंगे। शांति का वास्तविक अर्थ है कि हर बच्चा निर्भय होकर पढ़ सके और हर परिवार सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।

नशे की बढ़ती प्रवृत्ति छत्तीसगढ़ के सामने एक गंभीर सामाजिक चुनौती है। आज हमारा छत्तीसगढ़ 26 वर्ष का युवा राज्य है। राज्य की युवा शक्ति को नशे की गिरफ्त में न फंसते हुए ज्ञान, कौशल, खेल, नवाचार और उद्यमिता के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। माता-पिता, शिक्षक, समाज और सरकार को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें युवा अपनी ऊर्जा को पहचानें, बुरी संगत से बचें और अपने सपनों के प्रति जागरूक बनें। स्मरण योग्य तथ्य यह है कि नशा एक व्यक्ति का भविष्य नहीं बिगाड़ने के साथ उसके पूरे परिवार की खुशियाँ छीन लेता है।

छत्तीसगढ़ के युवाओं को रोजगार, शिक्षा और बेहतर अवसरों के लिए देश-विदेश में जाना पड़े तो यह परीदेश के लिए गर्व की बात होनी चाहिए। राज्य के युवाओं से अपेक्षा है कि जहाँ भी जाएँ, अपनी माटी की महक, अपनी बोली, अपने संस्कार और अपने लोगों का सम्मान कभी नही भूलेंगे। दुनिया के मंच पर अपनी प्रतिभा से छत्तीसगढ़ का नाम रोशन करेंगे और अपनी सफलता से प्रदेश के दूसरे युवाओं के लिए प्रेरणा बनेंगे।

छत्तीसगढ़ को वैश्विक पहचान दिलाना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी के साथ प्रदेश के प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है।ईमानदारी, स्वच्छता, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान और स्थानीय संस्कृति के प्रति गर्व हमारी नागरिकता की पहचान बनें। छत्तीसगढ़ का स्थापना दिवस यह संकल्प लेने के लिए शुभ अवसर है कि हम ऐसा छत्तीसगढ़ बनाएँ, जहाँ युवा नशे से दूर, अवसरों के करीब हों; विकास के साथ संस्कार हों; समृद्धि के साथ संवेदना हो और हर नागरिक का मन अपनी माटी को लेकर गौरवान्वित हो। मन में सदा यह बात रहे कि छत्तीसगढ़ हमारा निवास नहीं हमारी पहचान भी है, इस माटी का मान बढ़ाना ही स्थापना दिवस का सच्चा उत्सव है।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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