रांची। झारखंड और बिहार की पांच बंद सरकारी निगमों से जुड़े हजारों कामगारों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने पात्र दैनिक वेतनभोगी कामगारों को पहले से किए गए भुगतान के अतिरिक्त एकमुश्त 1-1 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही विलंबित ईपीएफ बकाया पर 12 प्रतिशत साधारण ब्याज और वेतन, मजदूरी तथा अन्य वित्तीय देयों पर 6 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया गया है।यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिया।

बिहार-झारखंड के बीच देनदारियों का विवाद

अदालत ने कहा कि बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के बाद दोनों राज्यों के बीच देनदारियों के बंटवारे को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद को समाप्त करने के लिए आवश्यक निर्देश दिए जा रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले भुगतान की गई राशि के अलावा पात्र दैनिक वेतनभोगियों को अतिरिक्त 1 लाख रुपये दिए जाएंगे।

इन पांच बंद निगमों से जुड़ा है मामला

मामला पांच बंद अंतरराज्यीय सरकारी निगमों के कर्मचारियों और कामगारों के बकाया भुगतान से जुड़ा है। इनमें शामिल हैं—

  • बिहार स्टेट कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड
  • बिहार स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड
  • बिहार स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड
  • बिहार स्टेट फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड
  • बिहार स्टेट पंचायती राज फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड

इसके अलावा झारखंड स्थित ईईएफ इलेक्ट्रिक इक्विपमेंट फैक्ट्री के कर्मचारियों से जुड़ा मामला भी इससे संबंधित है।

दैनिक वेतनभोगियों की मजदूरी पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान राज्यों की ओर से कुछ कामगारों की देनदारी की गणना वर्ष 1992 से प्रतिदिन 42.50 रुपये की दर से करने का आधार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरीके को उचित नहीं माना।

अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी का दैनिक वेतनभोगी होना इस बात का आधार नहीं हो सकता कि वर्षों तक उसकी मजदूरी का मूल्य एक ही दर पर स्थिर रहे। समय के साथ मजदूरी दरों में हुए बदलाव को नजरअंदाज कर पुरानी स्थिर दर पर भुगतान तय करना उचित नहीं है।

2,274 सत्यापित कर्मचारियों में 2,074 को भुगतान

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि कुल 2,274 सत्यापित कर्मचारियों और कामगारों में से 2,074 को मूल राशि का भुगतान किया जा चुका है। करीब 200 मामलों में भुगतान लंबित है। इनमें कर्मचारी या उनके कानूनी वारिसों का पता नहीं चल पाने अथवा आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने जैसी स्थितियां शामिल हैं।

सत्यापन नहीं होने वालों को 12 महीने का मौका

जिन कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों का अब तक सत्यापन नहीं हो पाया है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 12 महीने का अवसर दिया है। वे संबंधित निगम के नोडल अधिकारी से संपर्क कर आवश्यक दस्तावेज जमा कर सकते हैं। इसके बाद दावे की जांच कर पात्रता के अनुसार भुगतान किया जाएगा।

चार सप्ताह में वेबसाइट पर सार्वजनिक करनी होगी जानकारी

पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने बिहार और झारखंड सरकारों को चार सप्ताह के भीतर कर्मचारियों और कामगारों का अद्यतन विवरण सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है।

इसमें भुगतान प्राप्त कर चुके कर्मचारियों के नाम, पद, सेवा अवधि, भुगतान की राशि और भुगतान की तारीख जैसी जानकारी शामिल होगी। वहीं लंबित मामलों में देरी का कारण, जरूरी दस्तावेज और संबंधित नोडल अधिकारी की जानकारी भी वेबसाइट पर उपलब्ध करानी होगी।

लंबे समय से चले आ रहे विवाद के निपटारे की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों राज्यों ने 29 मई 2026 के आदेश के अनुसार अधिकांश भुगतान कर दिए हैं। अब शेष मामलों का भी जल्द निपटारा किया जाना है। कोर्ट के इस आदेश से झारखंड और बिहार के संबंधित पूर्व कर्मचारियों, दैनिक वेतनभोगी कामगारों और उनके परिवारों को बकाया भुगतान मिलने का रास्ता साफ हुआ है।