Dharm Desk : पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से महिलाएं अलग-अलग परंपराओं के अनुसार व्रत रखती हैं। उत्तर भारत में करवा चौथ का विशेष महत्व है, वहीं दक्षिण भारत ऐसी ही भावना से जुड़ा व्रत रखा जाता है। इस व्रत में सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां अच्छे जीवनसाथी की इच्छा से उपवास रखती हैं। इस बार खास बात यह है कि अटला तद्दे 28 अक्टूबर, बुधवार को और करवा चौथ 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस तरह इस बार तेलुगु समाज की महिलाएं करवा चौथ से एक दिन पहले अटला तद्दे का व्रत रखेंगी।

आश्विन कृष्ण तृतीया पर मनाया जाता है अटला तद्दे

अटला तद्दे तेलुगु समाज का पारंपरिक पर्व है, जो आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है, इसे मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मनाया जाता है। साथ ही कर्नाटक में भी कुछ समुदाय इस व्रत को करते हैं। इस दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले भोजन करती हैं और इसके बाद व्रत रखती हैं। शाम को देवी गौरी की पूजा की जाती है। चंद्रमा के दर्शन और पूजा के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। इस पर्व में महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और झूला झूलती हैं।

अट्लु पकवान है व्रत की खास पहचान

अटला तद्दे में अट्लु नामक पारंपरिक पकवान का विशेष महत्व है। यह डोसे जैसा व्यंजन होता है, जिसे चावल और उड़द की दाल से तैयार किया जाता है। महिलाएं इसे देवी गौरी को अर्पित करती हैं और फिर दूसरी सुहागिन महिलाओं को प्रसाद के रूप में देती है । कुछ परिवारों में 10 अट्लु चढ़ाने की परंपरा भी है। इस दिन महिलाएं मेहंदी लगाकर पारंपरिक तरीके से सजती-संवरती हैं। व्रत और पूजा के साथ यह त्योहार महिलाओं के आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक परंपराओं को भी दर्शाता है।

अटला तद्दे व्रत को रखने के नियम

अटला तद्दे में सुहागिन महिलाएं सूर्योदय से पहले भोजन करती हैं, जिसमें पारंपरिक रूप से चावल और उड़द की दाल से बने अट्लु यानी डोसे जैसे पकवान खाए जाते हैं। इसके बाद महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और चंद्रमा के दर्शन होने तक अन्न-पानी ग्रहण नहीं करतीं। शाम को माता गौरी की पूजा कर पति की लंबी उम्र की कामना की जाती है। तेलुगु में ‘अट्लु’ का अर्थ डोसे जैसी रोटी और ‘तद्दे’ का संबंध तृतीया तिथि से है। इस तरह यह व्रत करवा चौथ की तरह पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है।