Automobile Desk: नई कार खरीदने का रोमांच ही कुछ अलग होता है। जब हम शोरूम के चमकदार फ्लोर पर कदम रखते हैं और किसी गाड़ी के टॉप मॉडल पर नजर पड़ती है, तो उसमें दिए गए हाई-टेक फीचर्स देखकर तुरंत उसे बुक करने का मन करने लगाता है। बड़ी टचस्क्रीन, पैनोरमिक रूफ और तमाम आधुनिक गैजेट्स गाड़ी को अंदर से किसी लग्जरी स्पेसक्राफ्ट जैसा महसूस कराते हैं। कार कंपनियां और सेल्सपर्सन भी इन खूबियों को इस तरह पेश करते हैं कि हमें लगने लगता है कि इनके बिना गाड़ी अधूरी है। हम खुशी-खुशी लाखों रुपये ज्यादा चुकाकर टॉप वैरीअंट घर ले आते हैं, लेकिन कुछ ही हफ्तों या महीनों में यह अहसास होने लगता है कि इनमें से कई ऐसे फीचर्स थे जिनका इस्तेमाल हमने शायद ही कभी किया हो।

भारतीय सड़कों की बनावट, यहां का मौसम और रोजाना का ट्रैफिक कुछ ऐसे कारक हैं जो कई ग्लोबल फीचर्स को हमारे देश में लगभग बेमानी बना देते हैं। अगर आप भी हाल-फिलहाल कोई नई गाड़ी घर लाने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो कुछ खास फीचर्स पर आँख बंद करके पैसा बहाने से पहले उनकी असल उपयोगिता पर गौर कर लेना समझदारी होगी। आइए ऐसे ही पांच फीचर्स के बारे में बात करते हैं जिनके लिए टॉप मॉडल चुनकर अतिरिक्त पैसे देने से बचना चाहिए।

सबसे पहले बात करते हैं सनरूफ की, जो आज के समय में हर कार खरीदार की विशलिस्ट में सबसे ऊपर रहता है। लोगों को लगता है कि सनरूफ होने से गाड़ी का लुक प्रीमियम हो जाता है और वीकेंड ड्राइव्स पर यह बहुत शानदार लगेगा। लेकिन भारतीय मौसम की हकीकत इससे काफी जुदा है। हमारे देश के अधिकांश हिस्सों में साल के ज्यादातर महीने चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी रहती है। इसके अलावा सड़कों पर उड़ने वाली धूल और प्रदूषण का स्तर भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसे माहौल में जब आप कार का सनरूफ खोलते हैं, तो ठंडी हवा की जगह बाहर की लू और डस्ट अंदर आ जाती है, जिससे एसी पर लोड बढ़ता है। इसके अलावा, चलती हुई कार से सनरूफ के जरिए बाहर निकलना न सिर्फ ट्रैफिक नियमों के खिलाफ है बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है।

दूसरा ऐसा फीचर है इन-बिल्ट नेविगेशन सिस्टम। आज लगभग हर नई गाड़ी के इंफोटेनमेंट सिस्टम में कंपनी की तरफ से मैप और नेविगेशन इन-बिल्ट मिलते हैं। कागजों पर यह फीचर बहुत काम का लगता है, लेकिन असल जिंदगी में लोग रास्ता तलाशने के लिए अपनी पुरानी आदत यानी स्मार्टफोन और गूगल मैप्स पर ही भरोसा करते हैं। इन-बिल्ट नेविगेशन के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसके मैप्स को बार-बार अपडेट करना पड़ता है और रियल-टाइम ट्रैफिक या रास्ते के बदलावों की सटीक जानकारी कई बार समय पर नहीं मिल पाती। जब आपकी कार में एंड्राइड ऑटो और एप्पल कारप्ले का सपोर्ट पहले से मौजूद है, तो अलग से मिलने वाले नेविगेशन सिस्टम के पीछे हजारों रुपये खर्च करने का कोई खास औचित्य नहीं बनता।

तीसरे पायदान पर आता है जेस्चर कंट्रोल। कुछ प्रीमियम और महंगी गाड़ियों में अब हवा में हाथ के इशारे करके म्यूजिक ट्रैक बदलने या वॉल्यूम कम-ज्यादा करने का विकल्प मिलने लगा है। पहली बार देखने या किसी को दिखाने में यह तकनीक बेहद futuristic लगती है। मगर रोजमर्रा की ड्राइविंग में यह फीचर बहुत व्यावहारिक साबित नहीं होता। कई बार सेंसर ठीक से कमांड कैच नहीं करते और आपको दोबारा कोशिश करनी पड़ती है। व्यस्त ट्रैफिक में ड्राइव करते समय स्क्रीन के सामने हाथ हिलाने से ध्यान सड़क से भटक सकता है, जो सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है। इसके मुकाबले स्टीयरिंग व्हील पर दिए गए फिजिकल बटन या वॉल्यूम नॉब ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद होते हैं, जिन्हें बिना देखे भी आसानी से ऑपरेट किया जा सकता है।

चौथा फीचर है ऑटोमेटेड पार्किंग असिस्ट। कागजों और विज्ञापनों में यह खूबी किसी वरदान जैसी लगती है कि गाड़ी खुद-ब-खुद पार्किंग की जगह ढूंढ लेगी और स्टियरिंग अपने आप घूम जाएगी। लेकिन भारतीय शहरों की कंजूस पार्किंग स्पेस और तंग गलियों की असलियत कुछ और ही है। यहां गाड़ियों के बीच की दूरी इतनी कम होती है कि ऑटोमैटिक सेंसर कई बार सही से जगह भांप नहीं पाते और सिस्टम बार-बार एरर दिखाने लगता है। भीड़भाड़ वाले मार्केट या मॉल की बेसमेंट पार्किंग में जब पीछे से गाड़ियों का हॉर्न बज रहा हो, तब इस सिस्टम के भरोसे रहने पर पार्किंग में सामान्य से ज्यादा समय लग जाता है। अनुभवी ड्राइवर मैनुअली जितनी तेजी से गाड़ी पार्क कर लेते हैं, कई बार ऑटोमेटेड सिस्टम उसमें उलझा रहता है।

पांचवां फीचर है पैडल शिफ्टर्स। स्टीयरिंग व्हील के ठीक पीछे मिलने वाले ये छोटे-छोटे लेवर्स मैनुअल गियरशिफ्ट का अहसास कराते हैं। जो लोग ड्राइविंग के शौकीन हैं और जिन्हें हाईवे पर गियर बदलकर रफ्तार का रोमांच लेना पसंद है, उनके लिए यह ठीक लग सकता है। लेकिन ऑटोमैटिक गियरबॉक्स वाली गाड़ियां वैसे ही इतनी सहज और स्मूथ होती हैं कि शहर के ट्रैफिक में ड्राइव करते वक्त शायद ही कोई आम ड्राइवर पैडल शिफ्टर्स का इस्तेमाल करने की जहमत उठाता है। कुछ शुरुआती दिनों के उत्साह के बाद यह फीचर गाड़ी के कॉकपिट में महज शो-पीस बनकर रह जाता है। इसलिए गाड़ी खरीदते वक्त अपने बजट और ड्राइविंग पैटर्न को प्राथमिकता दें, न कि उन आकर्षक फीचर्स को जिनका इस्तेमाल साल में एकाध बार ही होना है।