Dharm Desk – सूर्य उपासना और छठी मैया की आराधना का महापर्व छठ नजदीक है। कार्तिक महीने में मनाया जाने वाला यह पर्व आस्था, संयम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं। पर्व की खास बात यह है कि इसमें डूबते सूर्य के साथ उगते सूर्य की भी पूजा की जाती है। छठ पर्व में पारंपरिक प्रसाद तैयार किया जाता है और घाटों पर परिवारों के साथ श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से मनाया जाने वाला यह पर्व अब देश के दूसरे शहरों में भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

चार दिनों तक होंगे विशेष अनुष्ठान

13 नवंबर, शुक्रवार : नहाय-खाय- छठ महापर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होगी। इस दिन व्रती स्नान करके घर की साफ-सफाई करते हैं। सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन बनाने और पूजा की तैयारियों में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

14 नवंबर, शनिवार : खरना- दूसरे दिन खरना किया जाएगा। व्रती दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को पूजा करते हैं। इस अवसर पर गुड़ की खीर, रोटी और अन्य पारंपरिक प्रसाद तैयार किया जाता है। पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करने के साथ निर्जला व्रत शुरू होता है।

15 नवंबर, रविवार : संध्या अर्घ्य- तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। व्रती बांस की टोकरी या सूप में ठेकुआ, फल, गन्ना और अन्य पूजन सामग्री रखकर घाट, सरोबर पर पहुंचते हैं। सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है।

16 नवंबर, सोमवार : उषा अर्घ्य- महापर्व के अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद पूजा पूरी करके व्रती पारण करते हैं। इसी के साथ 36 घंटे का कठिन व्रत का समापन होता है।

छठी मैया का व्रत कौन कर सकता है

छठ व्रत मुख्य रूप से परिवार की सुख-समृद्धि, संतान के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना से किया जाता है। महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी यह व्रत रख सकते है । इसे करने के लिए किसी विशेष उम्र या वैवाहिक स्थिति की अनिवार्यता नहीं है । श्रद्धालु अपनी आस्था, सामर्थ्य और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर व्रत का संकल्प लेते हैं । निर्जला उपवास कठिन हो सकता है, इसलिए बीमार, गर्भवती या नियमित दवाएं लेने वाले लोगों को व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

क्यों महापर्व कहलाता है छठ का व्रत

छठ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है । इसमें स्वच्छता, अनुशासन, सादगी और सामूहिक सहभागिता का विशेष महत्व है। प्रसाद तैयार करने से लेकर घाटों की सफाई और पूजा की व्यवस्था तक परिवार और समज के लोग मिलकर काम करते है। इस पर्व में सूर्य को जीवन, ऊर्जा और प्रकाश के स्रोत के रूप में नमन किया जाता है। लोकगीतों, पारंपरिक प्रसाद और घाटों पर एकत्रित श्रद्धालुओं की उपस्थिति से पर्व का वातावरण भक्तिमय हो जाता है।