बलांगिर:
ओडिशा के बलांगिर जिले के देओगांव ब्लॉक स्थित जरासिंहा में सोमवार से ऐतिहासिक एवं सुप्रसिद्ध 5 दिवसीय ‘पाटखंडा यात्रा’ का भव्य शुभारंभ हो गया है। यात्रा को लेकर सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। मूलाष्टमी तिथि से मंदिर में चली आ रही 16 उपचार पूजा के समापन के बाद मां पाटखंडा की पारंपरिक ‘खंडा धुआ’ (तलवार स्नान) की रस्म पूरी निष्ठा के साथ निभाई गई।
इस पारंपरिक रस्म के तहत 32 देहुरी (पुजारी/सेवक) एक भव्य शोभायात्रा के रूप में पाटखंडा मंदिर से सोनगढ़ नदी पहुंचे और मां पाटखंडा का प्रतीक मानी जाने वाली पवित्र तलवार को स्नान कराकर वापस लाए। इसके बाद रविवार देर रात पाटनगढ़ स्थित मां पाटणेश्वरी मंदिर से लाया गया पवित्र ‘पाट सिंदूर’ जरासिंहा मंदिर पहुंचा।
राजशाही काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार, जरासिंहा गांव के निवासियों और 32 देहुरियों ने गांव की सीमा पर पहुंचकर पाटनगढ़ से पैदल चलकर आए मां पाटणेश्वरी के सेवकों का भव्य स्वागत किया। जमींदार दुर्गा प्रसाद सिंहदेव और बरुआ संतोष थनापति ने पवित्र पाट सिंदूर का वरण (अभिवादन) कर उसे मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया। इस आध्यात्मिक पल का साक्षी बनने के लिए पूरा जरासिंहा गांव जनसैलाब में तब्दील हो गया था।
पाटनगढ़ मां पाटणेश्वरी मंदिर से दो सेवक रेशमी वस्त्र (पाट) और पवित्र सिंदूर लेकर कई किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए जरासिंहा पहुंचे थे। इसके बाद मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई। साथ ही आसपास के विभिन्न गांवों के गौंतिया (ग्राम प्रमुख), झांकर और सेवकों के घरों में भी इस पाट सिंदूर की विशेष पूजा की गई।

यात्रा प्रबंधन समिति के अनुसार, सोमवार दोपहर गुड़वेला ब्लॉक के नुआगांव के पास स्थित देझार जंगल में बरुआ के शरीर में मां पाटखंडा का शुभ आगमन (आविर्भाव) होगा, जिसके बाद मां जरासिंहा क्षेत्र में प्रवेश करेंगी।
राजशाही काल से चली आ रही यह ऐतिहासिक यात्रा अगले पांच दिनों तक तीन अलग-अलग ‘खला’ (पूजा स्थलों) में विशेष रीति-रिवाजों के साथ मनाई जाएगी। इस दौरान बलांगिर समेत आसपास के जिलों से हजारों श्रद्धालुओं के जुटने की संभावना है।

