Automobile Desk: गाड़ी चलाते समय छोटी-मोटी खरोंच या हल्का-फुल्का डेंट लगना तो बेहद सामान्य बात है. अक्सर लोग ऐसी छोटी-मोटी टूट-फूट को नजरअंदाज भी कर देते हैं, लेकिन जब कोई गंभीर एक्सीडेंट होता है तो गाड़ी के साथ-साथ मालिक की जेब पर भी अचानक भारी आर्थिक बोझ आ पड़ता है. ऑटो विशेषज्ञ मानते हैं कि हादसों के बाद रिपेयरिंग का बिल इस बात पर निर्भर करता है कि गाड़ी के किन हिस्सों में नुकसान हुआ है. कुछ पार्ट्स ऐसे हैं जिन्हें बदलना या ठीक कराना इतना महंगा साबित होता है कि कार मालिक का पूरा बजट बिगड़ जाता है. ऐसे वक्त में सही इंश्योरेंस कवरेज ही एकमात्र सहारा बनता है.

हादसे के वक्त सबसे पहला और बड़ा प्रहार कार के बाहरी हिस्से यानी बंपर, फेंडर, बोनट और दरवाजों पर होता है. अगर नुकसान मामूली हो तो डेंटिंग और पेंटिंग से काम चल जाता है, लेकिन प्लास्टिक और फाइबर से बने आधुनिक बंपर के पूरी तरह टूटने पर उसे बदलना ही एकमात्र विकल्प बचता है. इसके साथ-साथ गाड़ी के मूल रंग को मैच कराने के लिए महंगी पेंटिंग और लेबर चार्ज जुड़ते ही बिल अचानक काफी बढ़ जाता है.

आजकल की आधुनिक गाड़ियों में साधारण हैलोजन लाइट्स की जगह एडवांस एलईडी, मैट्रिक्स और स्मार्ट हेडलैंप्स का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है. इन हेडलैंप्स और टेललाइट्स में सिर्फ कांच या बल्ब नहीं होता, बल्कि कई तरह के सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट लगे होते हैं. यही वजह है कि एक मामूली सी टक्कर में अगर हेडलाइट असेंबली टूट जाए तो इसे बदलने का खर्च दसियों हजार रुपये तक पहुंच जाता है.

अक्सर सड़क हादसों या फिर अचानक उछले पत्थरों के कारण विंडशील्ड और साइड ग्लासेस में क्रैक आ जाते हैं. यदि दरार बड़ी हो तो ड्राइविंग की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कांच बदलना मजबूरी बन जाता है. आज की प्रीमियम और एडवांस कारों में विंडशील्ड के पीछे ऑटोमैटिक वाइपर, वाइपर सेंसर्स और एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) के कैमरे लगे होते हैं. ऐसे में सिर्फ कांच बदलना ही काफी नहीं होता, बल्कि उन सेंसर्स को दोबारा री-कैलिब्रेट कराने में भी अलग से मोटा खर्च आता है.

सड़क के गड्डों या तेज रफ्तार में हुई टक्कर के दौरान कार के अलॉय व्हील्स और टायरों पर सीधा असर पड़ता है. अलॉय व्हील अगर एक बार टेढ़ा हो जाए या उसमें क्रैक आ जाए तो सुरक्षा के लिहाज से उसे रिपेयर करने के बजाय नया लगाना ही सुरक्षित माना जाता है. बड़ी गाड़ियों और प्रीमियम सेडान या एसयूवी में इस्तेमाल होने वाले बड़े साइज के अलॉय व्हील्स और लो-प्रोफाइल टायरों की कीमत बेहद ज्यादा होती है, जो रिपेयरिंग बिल को अचानक काफी ऊपर पहुंचा देती है.

अगर एक्सीडेंट का प्रभाव बहुत ज्यादा हो तो नुकसान गाड़ी के बाहरी ढांचे को चीरता हुआ इंजन, रेडिएटर, सस्पेंशन और एयरबैग्स तक जा पहुंचता है. इंजन और एयरबैग असेंबली किसी भी गाड़ी के सबसे कीमती हिस्सों में गिने जाते हैं. एक्सीडेंट के दौरान एयरबैग्स खुलने के बाद उन्हें पूरा रिप्लेस करना पड़ता है. वहीं इंजन ब्लॉक या रेडिएटर के डैमेज होने पर मरम्मत का कुल बिल लाखों रुपये तक चला जाता है.

ऐसे बड़े आर्थिक झटकों से बचने के लिए एक व्यापक (कॉम्प्रिहेंसिव) कार इंश्योरेंस पॉलिसी सबसे कारगार साबित होती है. हालांकि, क्लेम करते समय यह बात ध्यान में रखनी बेहद जरूरी है कि आपको कितना पैसा वापस मिलेगा, यह आपकी पॉलिसी के प्रकार, गाड़ी की उम्र, उसमें जुड़े ऐड-ऑन कवर्स (जैसे जीरो डेप) और तय डिडक्टिबल्स पर निर्भर करता है. इसलिए नई कार खरीदते समय या पुरानी पॉलिसी का नवीनीकरण कराते समय सिर्फ कम प्रीमियम पर ध्यान न देकर कवरेज की शर्तों को बारीकी से समझना जरूरी है.