Dharm Desk :- आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी सनातन परंपरा में अत्यंत दुर्लभ और फलदाई मानी गई है। साल भर में आने वाली सभी 24 एकादशियों में से केवल यही एक मात्र ऐसी एकादशी है। जिसका मुख्य उद्देश्य पितरों की आत्मशांति, तृप्ति और मुक्ति होता है। यह पावन व्रत इस वर्ष 6 अक्टूबर को रखा जाएगा। मान्यता है कि यदि परिवार का कोई पूर्वज जाने-अनजाने हुए पापों के कारण यमलोक की यातनाएं झेल रहा हो या किसी नीच योनि में भटक रहा हो तो इस दिन विधि-विधान से व्रत रखकर उसका पुण्य अपने पितरों को अर्पित करने से उन्हें तुरंत यमलोक के कष्टों से मुक्ति और बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
पितरों के निमित्त विष्णु पूजा और तर्पण की सरल विधि
प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु श्री शालिग्राम रूप के समक्ष जल और कुशा लेकर व्रत का संकल्प लें।भगवान को पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें।
दोपहर के समय पितरों के नाम से जल, काले तिल और दूध मिलाकर तर्पण करें।
भोजन तैयार कर उसमें से पहला अंश गाय, कुत्ते, कौवे और देवताओं के लिए पंचबलि अवश्य निकालें।
इसके बाद योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं।
दिनभर ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का मानसिक जाप करें और संध्या काल में इंदिरा एकादशी की कथा सुनें।
शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि 6 अक्टूबर को सुबह 2:07 बजे शुरू होगी और व्रत का पारण 7 अक्टूबर को सुबह 6:17 बजे से 08:38 बजे के बीच किया जाएगा।

इंदिरा एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा
इंदिरा एकादशी का संबंध पौराणिक काल की एक पावन कथा से है जिसका वर्णन पद्म पुराण में मिलता है। माहिष्मती नगरी के धर्मात्मा राजा इंद्रसेन के पिता पिछले जन्म के किसी कर्मफल के कारण यमलोक में कष्ट भोग रहे थे। जब महर्षि नारद ने राजा को यह बात बताई तो उन्होंने राजा को आश्विन कृष्ण एकादशी का व्रत रखने का परामर्श दिया। नारद मुनि के बताए अनुसार राजा इंद्रसेन ने पूरे विधि-विधान और निष्ठा के साथ यह व्रत रखा और इसका संपूर्ण पुण्य फल अपने पिता को समर्पित कर दिया। इस महाव्रत के प्रभाव से उनके पिता को तुरंत यमलोक की सभी यातनाओं से मुक्ति मिल गई और वे दिव्य विमान में सवार होकर सीधे स्वर्ग लोक चले गए।

