रवि साहू नारायणपुर। घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और उफनते नदी-नालों के बीच बसा अबूझमाड़… एक ऐसा इलाका, जो दशकों तक देश के नक्शे पर होते हुए भी विकास की रोशनी से अछूता रहा। यह वही जमीन है, जहां वर्षों तक बंदूक की आवाज ने शासन की आवाज को दबा दिया था, जहां नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती थी और जहां एक-एक दाना अनाज भी संघर्ष की कहानी कहता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है… और यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि ग्रामीणों की आंखों में लौट आई उम्मीद, चेहरे पर आई मुस्कान और जीवन में आई सहजता में साफ झलकता है।

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अबूझमाड़ का नाम सुनते ही एक ऐसा भूगोल सामने आता है, जहां पहुंचना ही किसी चुनौती से कम नहीं। बीते पांच दशकों तक यह इलाका नक्सल प्रभाव के सबसे गहरे साये में रहा। नक्सलियों ने यहां विकास को जड़ से रोक रखा था,सड़क, पुल, स्कूल, राशन दुकान हर सुविधा पर जैसे बंदूक की पहरेदारी थी।यदि कहीं सड़क या पुलिया बनने की कोशिश होती, तो आईईडी लगाकर उसे उड़ा दिया जाता। प्रशासन की पहुंच लगभग शून्य थी और ग्रामीण अपने ही देश में मानो अलग-थलग पड़ गए थे।

सबसे दर्दनाक तस्वीर थी, राशन की

35 किलो चावल के लिए 50 से 60 किलोमीटर का पैदल सफर और 2 से 3 दिन का समय,कंधों पर बोझ, पैरों में छाले और मन में डर,ग्रामीण बताते हैं कि कई बार उन्हें नदी-नाले पार करते हुए जान का जोखिम उठाना पड़ता था। और जब किसी तरह राशन लेकर गांव पहुंचते, तो उसमें से भी लगभग आधा हिस्सा नक्सलियों को देना पड़ता था। यानी भूख से लड़ते इंसान से उसका हक भी छीन लिया जाता था।

ऐसा ही एक गाँव है ढोढरबेड़ा जो गवाह है उस दौर का,जिला मुख्यालय से करीब 85 किलोमीटर दूर स्थित ढोढरबेड़ा गांव आज भी उस दर्दनाक अतीत की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है।वर्ष 1997-98 में यहां पीडीएस गोदाम बनाया गया था,उम्मीद थी कि गांव आत्मनिर्भर होगा, लोगों को राहत मिलेगी।लेकिन नक्सलियों के बढ़ते दबाव और खतरे के कारण महज दो वर्षों में ही यह गोदाम बंद हो गया। इसके बाद ग्रामीणों को 20 किलोमीटर दूर ओरछा ब्लॉक मुख्यालय तक पैदल जाना पड़ता था। रास्ते में नक्सलियों का डर, वापसी में भारी बोझ और अंत में उस राशन का भी एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों को सौंपना पड़ता था।

आज भी ढोढरबेड़ा के पीडीएस गोदाम की दीवारों पर लिखे नक्सली नारे और चुनाव बहिष्कार जैसे संदेश उस काले दौर की खामोश गवाही देते हैं। वहीं सुरक्षा, संकल्प और सिस्टम अचानक बदलाव नहीं आया, इसके पीछे है,सुरक्षा बलों का लगातार बढ़ता दायरा, पुलिस कैंपों की स्थापना, और शासन-प्रशासन की सक्रिय एवं संवेदनशील पहल।केंद्र सरकार की नक्सल मुक्त भारत की रणनीति और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के स्पष्ट संकल्प ने जमीनी स्तर पर असर दिखाना शुरू किया है।

सुरक्षा बलों ने न सिर्फ नक्सलियों के प्रभाव को कमजोर किया, बल्कि उन इलाकों में भरोसा भी कायम किया, जहां पहले सिर्फ डर था। और नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन की पहल ने इस बदलाव को गति दी। अब पीडीएस गोदाम से राशन ट्रैक्टर के जरिए सीधे गांवों तक पहुंचाया जा रहा है।

आज स्थिति यह है कि अबूझमाड़ के 18 से अधिक गांवों में ट्रैक्टर से राशन वितरण हो रहा है। जिन गांवों में कभी सचिव तक नहीं पहुंच पाता था, वहां अब सरकारी योजनाएं दस्तक दे रही हैं।इसके साथ ही कई स्थानों पर नए पीडीएस गोदामों का निर्माण भी जारी है, ताकि आने वाले समय में यह व्यवस्था और मजबूत हो सके। ग्रामीणों की आंखों में अब डर नहीं, भरोसा है। वे बताते हैं कि अब उन्हें न तो लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, न ही राशन के लिए दिनों तक भटकना पड़ता है।

पहले राशन लाने में 3 दिन लग जाते थे, अब गांव में ही मिल जाता है,पहले आधा राशन देना पड़ता था, अब पूरा घर के लिए बचता है. ऐसे कई स्वर अबूझमाड़ के जंगलों में गूंज रहे हैं, जो बदलाव की सच्ची तस्वीर पेश करते हैं। हालांकि, यह बदलाव सराहनीय है, लेकिन अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं को पूरी तरह मजबूत करना अभी बाकी है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अब रास्ता खुल चुका है,भय की जगह विश्वास ने ले ली है और बंदूक की आवाज को अब विकास की आहट दबाने लगी है।

अबूझमाड़ की यह कहानी सिर्फ एक इलाके के बदलने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जीत है जो वर्षों बाद सही मायनों में जमीन तक पहुंची है। जहां कभी भूख, भय और बेबसी थी,वहां अब सुविधा, सुरक्षा और सम्मान की नई शुरुआत हो चुकी है।

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन कहती है,अबूझमाड़ के अंदरूनी इलाकों में पहले पीडीएस की दुकाने नही होती थी ग्रामीणों को ओरछा तक आना पड़ता था अपना राशन लेने के लिए, दुकानों की स्वीकृती अब हमारे द्वारा ग्राम पंचायतों में दे दी गई है,जो अभी निर्माणाधीन है, और ग्रामीणों को 50-60 किलोमीटर की दूरी तय करके ओरछा न आना पड़े इसलिए हमने पीडीएस राशन है उसे ट्रैक्टर से गाँव भिजवा रहें है और हमने नोडल अधिकारी ग्राम पंचायत के लिए नियुक्त किया है वो जा रहे और इंश्योर कर रहें गाँव वाले उपस्थित रहें और वहाँ पर प्रॉपर अरेजमेंट रहें और वहाँ से गाँव वाले अपना राशन लेकर जाये और नोडल अधिकारी सुनिश्चित करें कोई दिक्कत न हो और साथ ही साथ गांव में राशन का वितरण सही तरीके से चल रहा है।

आगे उहोने कहा 50-60 किमी से पैदल चलकर राशन लेने आते थे ग्रामीण जैसे जाटलूर, थूलथूली,जटवर, बालेबेड़ा के गाँव वाले भी ओरछा आते थे और ओरछा से पैदल राशन लेकर जाते थे, अभी हमने जो व्यवस्था की है उससे उन्हें ओरछा तक नहीं आना पड़ रहा है राशन उन्हें उनके गांव में मिल रही है और नोडल अधिकारियों से यह सुनिश्चित भी किया जा रहा है कि उन्हें जितना किलोग्राम उन्हें बटना है वह बट रहा है।

कलेक्टर नम्रता जैन कहती है शासन-प्रशासन के मनसा अनुरूप गाँवो लेवल पर मूलभूत सुविधाओं का काम चल रहा है, कम्युनिटी बिल्डिंग बनने हैं, पीडीएस दुकान, आश्रम, आंगनबाड़ी बनने है ,स्कूल सभी खोले जा रहे हैं, और पीडीएस में हम यह भी कोशिश कर रहे हैं कि राशन को गांव में भंडारण कराया जा, और जहां बिल्डिंग नहीं है वहां गांव तक राशन ले जाकर वितरण कराया जाए।

बालक आश्रम ढोढरबेड़ा में भृत्य के पद पर पदस्थ छन्नू राम पोटाई कहते हैं पहले राशन को लेकर बहुत दिक्कतें होती थी, नक्सली नदी,नाला,रोड बनाने नहीं देते थे, अब रोड बन गया है तो ट्रैक्टर में राशन आ जाता है जिससे काफ़ी सहूलियत है।आश्रम में कक्षा पहली से आठवीं तक 47 छात्र-छात्राएं अध्यनरत हैं, बारिश के पहले मई जून में 3 माह का राशन लाकर आश्रम में डंप कर लेते थे बारिश कम होता था तो फिर जाकर ओरछा से लाते थे।

राशन लाते वक्त जंगली जानवरों का भी भय रहता था विशेष कर भालू का, आश्रम में जो मध्यान भोजन बनता है उस पर भालू ने हमला किया है और दो-तीन बार उसके सर में गंभीर चोट आई है। पुलिस कैंप खुलने के बाद काफी बदलाव हुआ है,आइटीबीपी के जवान बच्चों को किताब कॉपी, कम्पास, पेन, स्लेट पट्टी,कैरम बोर्ड इत्यादि सामग्री देते रहते हैं।

स्थानीय ग्रामीण दुसाराव गोटा कहते हैं कि पहले राशन के लिए ढोढरबेड़ा से ओरछा तक 20 किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता था पैदल जाने वालों को 4 घंटा लगता था साइकिल से जाने वालों को 3 घंटा लगता था, पुलिस कैंप खुला तो सुविधा मिलने लगा ट्रैक्टर से चावल गांव तक पहुंच रहा है, गांव में ही चावल, नमक, गुड इत्यादि मिलता है। पहले चावल लाते थे उसमे से नक्सलीयों को और मिलिशिया पार्टी को देना पड़ता था। अभी बहुत अच्छा लग रहा है नक्सली भी खत्म हो गए और गांव में राशन पहुंच रहा है।

गांव की मितानिन बीतरी बाई गोटा कहती है पहले नक्सली थे तो काफी समस्या थी अब सुविधा मिलने लगी है, पहले बच्चे लोगों को पाकर 20 किलोमीटर दूर ओरछा जाते थे चावल लाने के लिए, रात हो जाने से कई बार ओरछा में ही रात रुकना पड़ता था। अब राशन में चावल, गुड़,नमक, शक्कर, चना सब गांव में ही मिल रहा है। नक्सलियों से हम बहुत डरते थे और डर की वजह से पहले उन्हें राशन देते थे, अब नक्सली गांव में नहीं आते।

ग्राम पंचायत ढोढरबेड़ा के पीडीएस के सेल्समेन लच्छूराम ध्रुव ने कहा गाँव में पीडीएस गोदाम 1997-98 में बना था 3 साल तक संचलन हुआ उसके बाद नक्सलियों की वजह से बंद हो गया, उसके बाद ओरछा में संचालित किया जा रहा था, वहां से हितग्राही राशन सर में ढोकर लाते थे, वर्तमान में पीडीएस गोदाम पुनः शुरू हो गया है और गांव तक राशन पहुंच रहा है। पहले नक्सली ग्रामीण से अनाज ले जाते थे और हमसे भी मांगते थे, और हम डर के वजह उन्हें अनाज देते थे। अब नक्सली नहीं आते पुलिस कैंप खुलने से काफी बदलाव हुआ है।

ग्राम पंचायत गोमागाल के सेलसमेन रामजी वड्डे ने कहा इलाका नक्सल मुक्त होने के बाद सड़क बनने लगी है, अब ट्रैक्टर से लोड करके ग्राम पंचायत गोमागाल के आश्रित ग्राम ब्रेहबेड़ा में चावल वितरण के लिए ले जाया जा रहा है,जो ओरछा से 25 किलोमीटर है।