प्रदीप मालवीय, उज्जैन। हर साल गणेशोत्सव के दौरान पूरे भक्तिभाव और श्रद्धा के साथ बप्पा को घर लाने के बाद, विसर्जन के समय सामने आने वाली तस्वीरें न केवल दिल दुखाती हैं बल्कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक संवेदनहीनता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं। धार्मिक नगरी उज्जैन के मुनीनगर स्थित दो तालाबों के पास से एक ऐसी ही तस्वीर सामने आई है, जहां नगर निगम के कुप्रबंधन और घोर लापरवाही के चलते भगवान श्री गणेश और माता लक्ष्मी की सैकड़ों प्रतिमाएं सड़क किनारे लावारिस स्थिति में पड़ी रहीं।
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‘मूर्ति कलेक्शन सेंटर’ नीति और लापरवाही का घालमेल
दरअसल, नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए प्रशासन द्वारा मुख्य तालाबों में सीधे विसर्जन पर रोक लगाई जाती है। इसके विकल्प के रूप में नगर निगम द्वारा ‘मूर्ति संग्रहण केंद्र’ (कलेक्शन सेंटर) बनाए जाते हैं, जहां श्रद्धालुओं से प्रतिमाएं जमा करवाकर उन्हें ससम्मान विसर्जित करने का दावा किया जाता है। लेकिन उज्जैन के मुनीनगर तालाब पर शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर प्रशासन के इन दावों की पोल खुल गई।
धूल और कचरे के बीच लावारिस छोड़ दी गईं प्रतिमाएं
नगर निगम के कर्मचारियों ने आम नागरिकों से गणेश प्रतिमाएं जमा तो कर लीं, लेकिन उनका सम्मानजनक विसर्जन करने के बजाय उन्हें तालाब के किनारे सड़क पर ही छोड़ दिया। घंटों तक बप्पा की मूर्तियां सड़क किनारे धूल, मिट्टी और कचरे के बीच लावारिस पड़ी रहीं। विसर्जन के नाम पर हुए इस अपमान से वहां से गुजरने वाले श्रद्धालुओं और आम नागरिकों की भावनाएं गहराई से आहत हुईं।
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पर्यावरण संरक्षण के नाम पर आस्था से खिलवाड़ क्यों?
घटना से आक्रोशित शहर के नागरिक राजकुमार गेहलोत ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन भगवान की हम 10 दिनों तक पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, विसर्जन के नाम पर उनका इस तरह का अनादर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पर्यावरण बचाने का संदेश देना अच्छी बात है, लेकिन इसकी आड़ में श्रद्धालुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ करना और भगवान का अनादर करना सरासर गलत है। जिला प्रशासन और नगर निगम को तुरंत इस ओर ध्यान देकर दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई करनी चाहिए।
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