महालया के साथ बाबा नगरी में बढ़ी रौनक, तांत्रिक विधि-विधान से होती है पूजा-अर्चना; सप्तमी, अष्टमी और नवमी पर बंद रहते हैं मां काली, मां पार्वती और मां संध्या मंदिर के कपाट
देवघर। पितृ पक्ष की समाप्ति के साथ ही महालया का आगमन हो गया है। इसी के साथ मां दुर्गा के स्वागत और शारदीय नवरात्र की तैयारियों ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। झारखंड की बाबा नगरी देवघर में भी दुर्गा पूजा को लेकर विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिल रहा है। यहां स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में मां शक्ति की आराधना की परंपरा बेहद विशिष्ट है। मान्यता है कि यह धाम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल होने के साथ माता सती के हृदय शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है।
10 दिनों तक तांत्रिक विधि से होती है पूजा
बाबा बैद्यनाथ धाम में दुर्गा पूजा के दौरान दस दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान मंदिर परिसर में तांत्रिक विधि-विधान से मां शक्ति की उपासना होती है। पूजा शुरू होने के साथ ही बाबा मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने लगी है। देश के अलग-अलग हिस्सों से भक्त भगवान बैद्यनाथ के दर्शन और मां शक्ति की आराधना के लिए देवघर पहुंच रहे हैं।
मंदिर के वरिष्ठ पुजारी एवं धर्माचार्य लम्बोदर परिहस्त के अनुसार, दुर्गा पूजा के दौरान हजारों श्रद्धालु बाबा धाम पहुंचकर मां जगदंबा की पूजा करते हैं और अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं। इस दौरान हवन कुंड में तांत्रिक विधि से विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं, जिनमें श्रद्धालु भी भाग लेते हैं। बाबा मंदिर में दुर्गा सप्तशती के पाठ का विशेष महत्व माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि विजयादशमी तक चलने वाले इस अनुष्ठान के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ और गुरु से प्राप्त दीक्षा मंत्र का विधिपूर्वक जाप करने से मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सप्तमी से नवमी तक बंद रहते हैं तीन मंदिरों के कपाट
धर्माचार्य उदय शंकर बताते हैं कि बाबा बैद्यनाथ धाम में दुर्गा पूजा की परंपरा और पूजा पद्धति अन्य स्थानों से अलग है। यहां दस दिनों तक तांत्रिक विधि-विधान से मां शक्ति की आराधना की जाती है। धाम के शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित होने के कारण यहां की पूजा का विशेष धार्मिक महत्व है।
उनके अनुसार, दुर्गा पूजा के दौरान सप्तमी, अष्टमी और नवमी को मां काली, मां पार्वती और मां संध्या के मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। विजयादशमी के दिन इन्हें दोबारा खोला जाता है। इस अवधि में हवन कुंड में रातभर तांत्रिक विधि से पूजा-अर्चना किए जाने की परंपरा है।पंडित उदय शंकर के मुताबिक, बाबा मंदिर में तांत्रिक पद्धति से पूजा किए जाने की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है।
मिथिलांचल से बड़ी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु
दुर्गा पूजा के दौरान बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं। दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी समेत कई जिलों से भक्त मां शक्ति की आराधना के लिए देवघर आते हैं। श्रद्धालुओं के आगमन से बाबा नगरी में धार्मिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं।
पंडा अंकित बाबा बताते हैं कि सावन की तरह दुर्गा पूजा के दौरान भी कई श्रद्धालु कांवर लेकर बाबा धाम पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाबा बैद्यनाथ धाम की विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के साथ माता सती के हृदय शक्तिपीठ की भी मान्यता जुड़ी हुई है। यही वजह है कि नवरात्र और दुर्गा पूजा के अवसर पर यहां मां शक्ति की उपासना के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं।
नवरात्र में और बढ़ेगी बाबा नगरी की रौनक
स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में माता पार्वती के मायके के रूप में बिहार के सीतामढ़ी का भी उल्लेख मिलता है। इसी वजह से बिहार के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा मंदिर पहुंचते हैं। बाबा बैद्यनाथ धाम में माता सती की पूजा-अर्चना की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है।
महालया के साथ ही बाबा नगरी में मां दुर्गा की आराधना का माहौल बनने लगा है। आने वाले दिनों में शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने की संभावना है।

