गोविंद पटेल, कुशीनगर. नेपाल से निकलने वाली बड़ी गंडक नदी कुशीनगर के खड्डा और तमकुहीराज तहसील क्षेत्रों से होकर गुजरती है. हर साल बाढ़ से बचाव के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने, तटबंधों की मरम्मत, ठोकरों के निर्माण और सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद इस बार तमकुहीराज क्षेत्र में एपी तटबंध टूटने से बाढ़ सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. चैनपट्टी के पास तटबंध टूटने के बाद देखते ही देखते तीन दर्जन से अधिक गांवों में पानी पहुंच गया और ग्रामीणों के सामने घर, फसल और परिवार को सुरक्षित बचाने की चुनौती खड़ी हो गई.

बाढ़ के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हर वर्ष मानसून से पहले संवेदनशील तटबंधों की मरम्मत और सुरक्षा के दावे किए जाते हैं, तो नदी के उफान पर आते ही तटबंध कमजोर क्यों पड़ जाते हैं? क्या बाढ़ से पहले तटबंधों की वास्तविक स्थिति का पर्याप्त तकनीकी निरीक्षण और जरूरी मरम्मत हुई थी? यदि हुई थी तो एपी तटबंध टूटने की नौबत क्यों आई?

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छह वर्षों से जमे अधिकारी पर भी उठ रहे सवाल

बाढ़ खंड के कार्यों और निगरानी व्यवस्था को लेकर विभागीय जिम्मेदारी पर भी सवाल उठ रहे हैं. कुशीनगर में पिछले करीब छह वर्षों से बाढ़ खंड अधिकारी महेश सिंह के कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. ग्रामीणों और स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि लंबे समय से बाढ़ की समस्या झेल रहे क्षेत्रों में लगातार किए जा रहे बचाव कार्यों के बावजूद तटबंधों की स्थिति स्थायी रूप से क्यों नहीं सुधर पा रही है. हालांकि अधिकारी की ओर से इस संबंध में पक्ष और तटबंध टूटने के तकनीकी कारण सामने आना भी जरूरी है.

करोड़ों के काम, फिर भी क्यों नहीं बच पाए गांव?

खड्डा क्षेत्र का भैसहा इलाका हो या तमकुहीराज का चैनपट्टी क्षेत्र, गंडक नदी के किनारे बने तटबंध और ठोकरें बाढ़ नियंत्रण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं. हर साल बाढ़ से पहले मरम्मत और सुरक्षा कार्यों पर खर्च होने वाली धनराशि के बीच इस बार तटबंध टूटने की घटना ने कार्यों की गुणवत्ता और उनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा कर दिया है. नदी का जलस्तर बढ़ते ही ग्रामीण इलाकों में पानी पहुंचा और प्रशासन को राहत एवं बचाव कार्य के लिए मैदान में उतरना पड़ा. हजारों एकड़ कृषि भूमि पर बाढ़ का खतरा मंडराने लगा. कई परिवारों के सामने विस्थापन और पशुओं को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की समस्या खड़ी हो गई.

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आरोपों के साथ सामने आया सियासी सवाल

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक अजय कुमार लल्लू ने भी बाढ़ खंड की तैयारियों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि विभाग के पास बाढ़ से निपटने के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं. हालांकि इन आरोपों पर बाढ़ खंड और प्रशासन का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है. तटबंध टूटने के वास्तविक कारण, पूर्व में कराए गए मरम्मत कार्य और उनकी तकनीकी स्थिति की जांच के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी.

मंत्री से सवाल, जवाब के बजाय बढ़ी चर्चा

मुख्यमंत्री के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आगमन के दौरान जब मीडिया ने जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह से तटबंध की मरम्मत और टूटने को लेकर सवाल किए तो मंत्री सवालों का जवाब दिए बिना आगे बढ़ गए. इस घटनाक्रम ने भी सवाल खड़ा कर दिया कि बाढ़ जैसी गंभीर आपदा के बीच तटबंधों की जवाबदेही और तैयारियों से जुड़े सवालों का जवाब आखिर कौन देगा. बाढ़ हर साल आती है, नदी का मिजाज भी नया नहीं है. फिर भी यदि हर साल मरम्मत के बाद तटबंध टूटते हैं और गांव पानी में डूबते हैं तो सवाल सिर्फ प्राकृतिक आपदा का नहीं रह जाता. सवाल उस व्यवस्था की तैयारियों, निगरानी, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और जवाबदेही का भी है, जिस पर बाढ़ से पहले ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है.