हेमंत शर्मा, इंदौर। शहर में बीजेपी की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ रैली सजकर तैयार थी। नेताजी मंच से लोकतंत्र का पाठ पढ़ा ही रहे थे कि अचानक भीड़ में एक ‘अनबुलाए मेहमान’ आ टपका। सोशल वर्कर प्रहलाद पांडे हाथ में एक पर्चा थामे सीधे मंच के सामने पहुंचे, जिस पर नगर निगम की खरीदी का बड़ा ही अनोखा गणित लिखा था- “30 हजार का बल्ब और 33 हजार का फिनाइल!” बस फिर क्या था, फिनाइल का नाम सुनते ही कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का पारा ऐसा चढ़ गया कि रैली का पूरा राजनीतिक एजेंडा ही धरा का धरा रह गया।

भ्रष्टाचार का पोस्टर दिखा तो उड़े मंत्री जी के होश

मंच से लोकतंत्र बचाने और अराजकता मिटाने के बड़े-बड़े दावे हो रहे थे, लेकिन जनता की नज़र प्रहलाद पांडे के उस पोस्टर पर जा अटकी। पोस्टर पर लिखा बल्ब और फिनाइल का दाम सीधे नगर निगम के बजट को चिढ़ा रहा था। जैसे ही कैलाश विजयवर्गीय की पैनी नज़र इस अनोखी पर्ची पर पड़ी, उनका कड़क मिज़ाज तुरंत बाहर आ गया। भाषण रोककर उन्होंने सीधे पुलिस को आवाज़ लगाई- “ये एक न्यूसेंस यहां पर आ गया… इधर आओ, पुलिस अधिकारी कोई आ जाए! एक पुलिस अधिकारी आ जाए!”

‘जवाब देना होगा तो देंगे’, फिर फरमान जारी- ‘गाड़ी में बिठाओ, यहां दिखना नहीं चाहिए’

मंत्री जी ने मंच से ही पोस्टर वाले भाई साहब को आड़े हाथों लेते हुए चेताया कि जहां जवाब देना होगा, वहां दे देंगे, अभी तो पतली गली पकड़ो, वरना लोग फ्री-फंड में जवाब दे देंगे! लेकिन इतने से जब मन नहीं भरा, तो सीधे खाकी को एक्शन का ऑर्डर थमा दिया- “ये न्यूसेंस कर रहा है, इसका कागज लो और इसको जरा गाड़ी में बिठा दो थोड़ी देर के लिए… इसको ले जाओ जरा यहां से, इसको गाड़ी में बिठाओ! यहां दिखना नहीं चाहिए।” मंत्री जी का हुक्म मिलते ही पुलिसकर्मियों की बत्ती जली, आनन-फानन में पोस्टर ज़ब्त हुआ और प्रहलाद पांडे को सरकारी गाड़ी की सैर कराने ले जाया गया।

‘इतने जूते खाने के बाद भी आ गया’, वीडियो हो गया वायरल

गुस्से के इस उफान में मंत्री जी के मुंह से कुछ ऐसे बोल भी निकल गए, जो अब इंटरनेट का सबसे चटपटा मसाला बन चुके हैं। उन्होंने भड़ास निकालते हुए कहा- “साला इतने जूते खाने के बाद में भी यहां पर आ गया जबरदस्ती में!” अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर 30 हज़ार के बल्ब और 33 हज़ार के फिनाइल में ऐसा कौन सा करंट था, जिसने मंत्री जी को इतना लाल-पीला कर दिया? अगर हिसाब गलत था तो माइक पर ही गणित समझा देते, सवाल उठाने वाले को सीधे गाड़ी में बिठाने का क्या तुक था?

‘लोकतंत्र बचाओ’ के मंच पर सवाल उठाने की जगह कितनी?

इस पूरे ड्रामे ने रैली के नाम और मंत्री जी के काम के बीच का फर्क जगज़ाहिर कर दिया है। जिस मंच से ‘लोकतंत्र बचाने’ की हुंकार भरी जा रही थी, उसी मंच के सामने जब एक आम नागरिक पोस्टर लेकर पहुंचा, तो उसे ‘न्यूसेंस’ की उपाधि देकर रवाना कर दिया गया। अब मुद्दा सिर्फ महंगे बल्ब और फिनाइल का नहीं रह गया है; असली सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र की रैली में सवाल पूछना गुनाह है? फिलहाल मंत्री जी का यह तेवर वाला वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर गर्दा उड़ा रहा है और लोग पूछ रहे हैं- “मंत्री जी, जवाब कब मिलेगा?”

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