इराक में पिछले दो दशकों से चला आ रहा अमेरिकी सैन्य दखल अब आधिकारिक तौर पर समाप्त होने जा रहा है. अमेरिकी सेना बुधवार तक इराक में अपने आखिरी बचे सैन्य अड्डों को भी पूरी तरह से खाली कर रही है. 2003 में सद्दाम हुसैन सरकार को हटाने के लिए इराक में दाखिल हुई अमेरिकी सेना अब अपनी आखिरी सैन्य मौजूदगी भी खत्म कर रही है. इराक में इस बात को लेकर चिंता भी है कि अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी खत्म होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों के बढ़ते प्रभाव और ISIS की वापसी को लेकर सुरक्षा चिंताएं सामने आ रही हैं.
अमेरिकी सेना ने इराक में अपने बचे हुए सैन्य ठिकानों से लोगों को वापस बुला रही है. इसकी शुरुआत साल 2003 में हुई थी, जब अमेरिकन सैनिक इराक पहुंचे. इसके साथ ही 2003 के अमेरिकी आक्रमण से शुरू हुआ सैन्य मौजूदगी का यह लंबा अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है.
अमेरिकी सेना की इस वापसी को ईरान और उसके सहयोगी गुट अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं. इराक में इस बात को लेकर चिंता भी है कि अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी खत्म होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं ने इराकी सुरक्षा बलों के साथ मिलकर ISIS के खिलाफ अभियान चलाया. 2017 तक इराक में ISIS के कब्जे वाले बड़े इलाकों को वापस ले लिया गया था. अमेरिकी सेना 2011 में पूरी तरह इराक से बाहर हो गई थी, लेकिन ISIS के बढ़ते खतरे के बाद उसे कुछ ही सालों में वापस लौटना पड़ा.
अब अमेरिकी सैनिकों की विदाई के साथ इराक में ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों के प्रभाव को लेकर चर्चा तेज है. इन गुटों का इराक की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था में पहले से प्रभाव रहा है. अमेरिकी मौजूदगी खत्म होने के बाद ईरान समर्थित सशस्त्र गुट अपना असर बढ़ा सकते हैं. वहीं ISIS के फिर से सक्रिय होने का खतरा भी बना हुआ है.
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