Dharm Desk :- देशभर में आज 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जा रहा है । इस दिन जगह-जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है । इसे भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। लेकिन भारत में कुछ जगह ऐसी भी हैं, जहां दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है। कहीं उसे भगवान शिव का परम भक्त और विद्वान माना जाता है, तो कहीं उसके साथ पारिवारिक रिश्ता जोड़ा जाता है। श्रीलंका में भी रावण को लेकर अलग-अलग सांस्कृतिक धारणाएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं उन प्रमुख जगहों के बारे में, जहां दशहरे पर रावण दहन की परंपरा नहीं है।

  1. बिसरख, उत्तर प्रदेश
    उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास स्थित बिसरख गांव को रावण का जन्मस्थान कहा जाता है। यहां के स्थानीय लोगों की मान्यता है कि रावण के पिता ऋषि विश्रवा का संबंध इस गांव से था। यहां रावण को केवल लंकापति के रूप में नहीं, बल्कि पूर्वज और भगवान शिव के भक्त के रूप में भी सम्मान दिया जाता है। दशहरे पर यहां रावण दहन के बजाय पूजा-पाठ और हवन किए जाते है ।
  2. मंदसौर, मध्य प्रदेश
    मध्य प्रदेश के मंदसौर में रावण को दामाद के रूप में सम्मान देने की परंपरा प्रचलित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका इसी क्षेत्र में था। इसी रिश्ते के कारण कुछ स्थानीय समुदाय रवण को सम्मान देते हैं। यहां खानपुर क्षेत्र में रावण की विशाल प्रतिमा भी स्थित है। दशहरे पर रावण दहन को लेकर यहां की परंपरा देश के अन्य हिस्सों से अलग है।
  3. जोधपुर और मंडोर, राजस्थान
    राजस्थान के जोधपुर और मंडोर क्षेत्र में कुछ ब्राह्मण समुदाय रावण को अपना पूर्वज मानते हैं। यहां रावण और मंदोदरी से जुड़ी परंपराएं प्रचलित हैं। दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के बजाय कुछ समुदाय उसके लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं और शोक भी मनाते है ।
  4. रावणग्राम, मध्य प्रदेश
    मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के रावणग्राम में रावण की प्रतिमा स्थापित है। यहां स्थानीय लोग उसे रावण बाबा के नाम से पूजते हैं। रावण के प्रति श्रद्धा और सम्मान के कारण यहा की परंपरा सामान्य रावण दहन से अलग है।
  5. कानपुर, उत्तर प्रदेश
    कानपुर में स्थित दशानन मंदिर रावण पूजा के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर के कपाट साल में विशेष रूप से दशहरे के दिन खोले जाते है। श्रद्धालु यहां रावण की पूजा करते हैं और दीप जलाते है। रावण के ज्ञान, विद्वता और शिवभक्ति को इस पूजा से जोड़ा जाता है।
  6. बैजनाथ, हिमाचल प्रदेश
    हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में इस स्थान को रावण की शिवभक्ति और तपस्या से जोड़ा है। यहां दशहरे पर रावण दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती। हालांकि, इसे रावण के स्वतंत्र पूजा स्थल के बजाय शिवभक्ति से जुड़ी परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
  7. श्रीलंका में रावण की लंका
    श्रीलंका में रावण को लेकर कई लोककथाएं और सांस्कृतिक धारणाएं प्रचलित हैं। कुछ लोग उसे शक्ति शाली राजा, कुशल प्रशासक और शिवभक्त के रूप में याद करते हैं। रवण के पुतले जलाने की परंपरा वहां व्यापक रूप से प्रचलित नहीं है।
  8. बस्तर
    बस्तर में भी दशहरा सामान्य रावण दहन के बजाय मां दंतेश्वरी की आराधना और आदिवासी परंपराओं पर केंद्रित होता है। बस्तर में दशहरे की परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां दशहरा एक-दो दिन नहीं, बल्कि करीब 75 दिनों तक मनाया जाता है। खास बात यह है कि इस दौरान रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यहां का दशहरा भगवान राम और रावण की कथा के बजाय मां दंतेश्वरी की पूजा और आदिवासी परंपराओं से जुड़ा है।