Dharm Desk – गणेश उत्सव के पावन दिनों के बाद गणपति बाप्पा की विदाई का समय आ जायेगा। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष गणेश विसर्जन (अनंत चतुर्दशी) 25 सितंबर को है बप्पा को विदा करने के साथ ही पूजा में रखी सामग्री- जैसे फूल-माला, दूर्वा, पीतांबर (वस्त्र), सुपारी, अक्षत और नारियल का क्या किया जाए, इसे लेकर अक्सर भक्तों में असमंजस की स्थिति रहती है? आमतौर पर लोग प्रतिमा के साथ पूजन सामग्री को भी जल में प्रवाहित कर देते हैं। जो प्रकृति के हिसाब से सही नहीं है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार, बप्पा की धार्मिक विदाई और पूजन सामग्री का निस्तारण दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों के अनुसार, विसर्जन से पहले इन वस्तुओं को प्रतिमा से हटाकर शास्त्र सम्मत तरीके से संभालना आवश्यक है।
पूजा सामग्री का शास्त्र सम्मत निस्तारण
- भगवान गणेश को अर्पित किए गए वस्त्र ‘सिद्ध प्रसाद’ बन जाते हैं। इन्हें कभी जल में विसर्जित नहीं करना चाहिए । पूजा संपन्न होने पर वस्त्रों को उतारकर परिवार के सदस्य स्वयं धारणकर सकते हैं या किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर सकते है ।
- पूजा पीठ पर स्थापित सुपारी में रिद्धि-सिद्धि और गणेशजी का अंश माना जाता है। इसे जल में बहाना ‘श्री’ (लक्ष्मी) को विसर्जित करने के समान है। विसर्जन से पूर्व इसे उठाकर अपने घर की तिजोरी, गल्ले या पूजा स्थल पर सुरक्षित रखें।
- श्रीफल (नारियल): कलश पर रखा नारियल साक्षात लक्ष्मी का प्रतीक है। इसे जल में विसर्जित करने के बजाय फोड़कर प्रसाद रूप में ग्रहण करें या घर के अन्न भंडार में रखें।
फूल-माला और दूर्वा का ‘भू-विसर्जन’
10 दिनों तक चढ़ाए गए फूल-माला और दूर्वा ‘निर्माल्य’ कहलाते है । निर्माल्य का अनादर या पैरों के नीचे आना पाप होता है। धर्मशास्त्रों में जल-विसर्जन के साथ-साथ ‘भू-विसर्जन’ (भूमि समर्पण) को भी 100% शुद्ध और पवित्र माना गया है।पर्यावरण और पवित्रता दोनों की रक्षा के लिए निर्माल्य को जल में फेंकने के बजाय घर के आंगन, गमले या किसी पवित्र पेड़ के पास मिट्टी में दबा देना चाहिए । समय के साथ यह मिट्टी में विलीन होकर ‘निर्माल्य खाद’ का रूप ले लेता है। इसके अलावा, सूखे निर्माल्य में कपूर मिलाकर उसकी धूपबत्ती या भस्म बनाना भी अत्यंत शुभ है।
शास्त्रों का नियम स्पष्ट है कि विसर्जन केवल मिट्टी की प्रतिमा का होता है। पूजा की ‘सिद्धि और शक्ति’ (सुपारी, वस्त्र, नारियल) को घर में समृद्धि के रूप में धारण किया जाता है, जबकि निर्माल्य का भू-विसर्जन कर प्रकृति का सम्मान किया जाता है।



