हेमंत शर्मा, इंदौर। पुलिस के बहुचर्चित ‘फर्जी प्लास्टर’ कांड में हर बीतते घंटे के साथ नया धमाका हो रहा है! पर्दों के पीछे छुपे नए चेहरे और चौंकाने वाले दावे सामने आ रहे हैं। हवा में तैरती ख़बरों और पुलिस महकमे की भीतरी कानाफूसी पर यकीन करें, तो खुफिया शाखा के जवान देवेंद्र यादव की गर्दन भी इस पूरे मामले में फंसती नज़र आ रही है। हालांकि, आला अफसरों ने अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है।
तीन-तीन थानों से डब्बा बंद… फिर भी लगातार मलाईदार पोस्टिंग?
सूत्रों के हवाले से उड़ी खबर की मानें, तो देवेंद्र यादव का विवादों से पुराना नाता रहा है। विजयनगर, खजराना और परदेशीपुरा जैसे वजनी थानों में साहब पहले भी तैनात रह चुके हैं। चर्चा तो यहाँ तक है कि साहब पर जब-जब ‘लेन-देन’ और वसूली के छींटे पड़े, उन्हें लाइन अटैच (डब्बा बंद) कर दिया गया। लेकिन अजूबा देखिए! हर बार लाइन अटैचमेंट का दाग धुल जाता और नई-नवेली पोस्टिंग की चाबी हाथ में आ जाती। अब सवाल महकमे के भीतर से ही उठ रहे हैं—आख़िर किस ‘ऊपरी रहम’ पर यह सब खेल चल रहा था?
विजयनगर से खजराना… और परदेशीपुरा तक का विवादित सफर
अंदर की बात यह है कि विजयनगर में लपेटे में आने के बाद देवेंद्र यादव ने गज़ब का पासा फेंका और सीधे खजराना थाने में खुफिया की सीट हथिया ली।
फिर खजराना का वो दिन कौन भूल सकता है? जब किसी क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने साहब को धर दबोचा था! मामला महिला से जुड़े एक विवाद का बताया गया, जहां ऐसा बवाल कटा कि बीट के पुलिसवालों को बीच-बचाव करके भीड़ के चंगुल से इन्हें बचाकर निकालना पड़ा। मामला बड़े साहबों की टेबल तक भी पहुंचा, लेकिन न जाने किस करामात से जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
परदेशीपुरा में भी खूब मचा बवाल
कहानी यहीं खत्म नहीं होती! इसके बाद साहब का ठिकाना बदला और परदेशीपुरा थाने में एंट्री हुई। वहां भी कारनामों का सिलसिला थमा नहीं। आरोप लगा कि एक बेगुनाह लड़के को घर से उठा लाया गया और घर से उठाते हुए सीसीटीवी फुटेज भी सामने आ गया युवक को थाने ले जाते ही उसकी जेब से चाकू बरामद कर उसे पर मामला दर्ज करवा दिया और 30000 की डिमांड की इसके बाद परदेशीपुरा से भी साहब को बोरिया-बिस्तर समेटकर लाइन अटैच होना पड़ा।
तो फिर हीरानगर कैसे पहुंच गई सवारी?
अब सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल! जब एक सिपाही का रिकॉर्ड शिकायतों की स्याही से काला था, जब बार-बार उसे लाइन हाज़िर किया जा रहा था… तो क्या नई पोस्टिंग देते वक्त उसकी सर्विस फाइल देखने का रिवाज़ खत्म हो चुका है?बिना किसी पुराने रिकॉर्ड की जांच किए, साहब को फिर से ‘हीरानगर’ जैसे संवेदनशील थाने का चार्ज सौंप दिया गया। और लीजिए… अब वहां फूटे ‘फर्जी प्लास्टर’ कांड में भी इन्हीं महाशय का नाम तेज़ी से उछल रहा है।
जांच की आंच में भूमिका, अब सिर्फ आधिकारिक बयान का इंतज़ार!
खाकी के भीतरी गलियारों की मानें तो ‘फर्जी प्लास्टर’ केस में देवेंद्र यादव से कड़ाई से पूछताछ चल रही है और उनकी परत-दर-परत भूमिका खंगाली जा रही है। हालांकि, पुलिस महकमे के किसी भी बड़े अफ़सर ने कैमरे पर आकर बयान जारी नहीं किया है और न ही किसी की आधिकारिक जिम्मेदारी तय की है।
यक्ष प्रश्न…
अगर किसी मुलाज़िम के खिलाफ विभागीय जांच की तलवार लटक रही हो, कई बार लाइन अटैचमेंट हो चुका हो, तो नई पोस्टिंग से पहले उसका सर्विस ट्रैक रिकॉर्ड खंगालना क्यों भूल जाते हैं? और अगर जांच होती है, तो फिर विवादों के शहंशाह बार-बार ऐसे मलाईदार और संवेदनशील थानों तक लैंड कैसे कर जाते हैं? इन तीखे सवालों के जवाब तो जांच का लिफाफा खुलने के बाद ही सामने आएंगे। लेकिन इतना तय है कि अगर आरोप साबित हुए, तो यह बात सिर्फ ‘फर्जी प्लास्टर’ तक सीमित नहीं रहेगी… बल्कि इंदौर पुलिस के आंतरिक सिस्टम और पोस्टिंग के पर्दे के पीछे चल रहे ‘सैटिंग कल्चर’ पर भी बड़ा हमला होगी।
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