Dharm Desk :- घर-घर में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा को निभाया जा रहा है। लोग अपने पितरों को याद कर उनकी आत्मा की शांति के लिए पूजन, तर्पण इत्यादि कर रहे हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि सबसे पहले श्राद्ध किसने किया होगा? इस सवाल से जोड़ी एक तथा महाभारत काल के प्रसंग से मिलती है। जिसमें महर्षि निमि उनके पुत्र श्रीमत और महर्षि अत्रि का प्रसंग आता है।

महाभारत में इस कथा का वर्णन

यहां युधिष्ठिर भीष्म पितामह से श्राद्ध की शुरुआत और इसके विधान के बारे में सवाल करते हैं। जवाब में भीष्म उन्हें महर्षि अत्रि, दत्तात्रेय, निमि और श्रीमत से जुड़ी यही कथा सुनाते हैं।
इसलिए महाभारत के इस घटना को देखें तो श्राद्ध करने वाले प्रथम व्यक्ति के रूप में महर्षि निमि का नाम सामने आता है। वहीं इसकी विधि के बारे में उन्हें महर्षि अत्रि ने बताया था। अत्रि ने यह भी साफ किया कि पितृयज्ञ का विधान स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा पहले से निर्धारित किया गया था।

बेटे की मौत के बाद महर्षि निमि ने किया था श्राद्ध

महाभारत में बताया गया है कि महर्षि अत्रि के वंश में दत्तात्रेय और उनके पुत्र निमि हुए। निमि के पुत्र का नाम श्रीमत था। श्रीमत ने लंबे समय तक कठोर तपस्या की।उन्होंने एक हजार वर्ष तक तप किया और इसके बाद उनका स्वर्गवास हो गया। बेटे की मौत से निमि को बहुत दुख हुआ।बेटे के जाने के बाद निमि ने अमावस्या के दिन ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाया। उनका आदर-सत्कार किया और अपने बेटे श्रीमत का नाम और गोत्र लेकर उन्हें पिंड अर्पित किए। यही वह प्रसंग है। जिसे महाभारत में श्राद्ध की शुरुआत से जोड़कर बताया गया है।
हालांकि श्राद्ध करने के बाद निमि खुद ही उलझन में पड़ गए। उनके मन में विचार आया कि पहले तो ऋषियों ने इस तरह श्राद्ध करने की परंपरा नहीं अपनाई थी। फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया, कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई।

निमि ने महर्षि अत्रि से जाना पितृ कर्म का महत्व

कथा के अनुसार उनके ध्यान करते ही अत्रि वहां प्रकट हुए। उन्होंने निमि को समझाया कि उन्होंने जो किया है। वह गलत नहीं है। यह पित्रों के लिए किया जाने वाला पितरों के प्रति कर्तव्य है।
अत्रि ने बताया यह परंपरा पहले से ही तय थी
महर्षि अत्रि ने निमि से कहा कि पितृयज्ञ का विधान पहले से ही निर्धारित है। इसके लिए उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है। अत्रि ने आगे श्राद्ध की विधि भी समझाई। इसमें पितरों के लिए पिंडदान के साथ अन्य देवताओं के लिए किए जाने वाले अर्पण का भी उल्लेख भी है।निमि को जब इस बात की जानकारी हुई तो उनका शक दूर हुआ। इसके बाद दूसरे ऋषियों ने भी इस परंपरा को अपनाया। धीरे-धीरे पितरों के लिए श्राद्ध, पिंडदान और जल अर्पित करने की परंपरा आगे बढ़ती गई।