Dharm Desk :- हर साल दशहरे पर देशभर में रावण दहन के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी जलाए जाते है। भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की खुशी में मनाए जाने वाले इस पर्व पर तीनों के पुतलों का दहन रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण के साथ उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले जलाने की परंपरा क्यों है? इसके पीछे रामायण में वर्णित लंका युद्ध की कहानी और उससे जुड़ा प्रतीकात्मक संदेश है । यह जो बताया गया है की कुंभकरण और मेघनाद दोनों ही शक्तिशाली योद्धा थे लेकिन उन्हें अधर्म का साथ दिया।

मेघनाद को रावण के साथ क्यों जलाया जाता है

मेघनाद रावण का पुत्र था। उसे इंद्रजीत भी कहा जाता है, क्योंकि मेघनाथ ने युद्ध में इंद्र को भी परास्त किया था। वह लंका की सेना का शक्तिशाली योद्धा था। उसने राम की सेना के साथ युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युद्ध के दौरान लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया था। दशहरे पर उसका पुतला जलाना लंका की उस शक्ति के अंत का प्रतीक माना जाता है, जिसने भगवान श्रीराम की सेना के विरुद्ध युद्ध किया था।

रावण के साथ कुंभकर्ण का पुतला क्यों जलाते हैं?

कुंभकर्ण रावण का छोटा भाई था। रामायण के अनुसार, वह अत्यंत बलशाली योद्धा था। लंबे सयम तक सोने के लिए प्रसिद्ध था। जब भगवान श्रीराम की सेना ने लंका पर चढ़ाई की, तब रावण ने कुंभकर्ण को युद्ध के लिए जगाया। कुंभकर्ण ने युद्ध में भाग लिया और अंततः भगवान श्रीराम के हाथों मारा गया। दशहरे पर उसका पुतला जलाना रावण की सेना की पराजय और अधर्म के पक्ष में खड़ी शक्ति के अंत से जोड़कर देखा जाता है।

तीनों के पुतले जलाने का क्या है संदेश

रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद तीनों लंका के प्रमुख योद्धा थे। रामायण की कथा में तीनों की मृत्यु के बाद लंका की शक्ति कमजोर पड़ गई। अंततः भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया । दशहरे पर तीनों के पुतलों का दहन इसी युद्ध प्रसंग को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से बुराई पर अच्छाई की जीत, अहंकार के अंत और गलत पक्ष का साथ देने के परिणामों का संदेश दिया जाता है ।