आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर (रविवार) को मनाई जा रही है। इस पावन रात्रि को ब्रज में ‘रास पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। शरद ऋतु की इसी उजली चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में बांसुरी की मधुर तान छेड़कर गोपियों के साथ महारास रचाया था। बांसुरी के सुर और रासलीला का प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध में वर्णित कथा के अनुसार, जब शरद रात में चंद्रमा अपनी संपूर्ण कलाओं से खिल रहा था और चारों ओर भीनी-भीनी सुगंध फैली थी। तब श्रीकृष्ण ने अपनी बंसी बजाई। उस मोहक धुन को सुनकर गोपियां अपने सारे काम-काज छोड़कर वन की ओर खिंची चली आई। भागवत में इस प्रसंग को जीवात्मा और परमात्मा के अनन्य मिलन के रूप में दर्शाया है।

कथा के अनुसार, भगवान ने अपनी योगमाया से ऐसा स्वरूप प्रकट किया कि प्रत्येक गोपी को यही अनुभव हुआ कि श्रीकृष्ण केबल उसी के साथ नृत्य कर रहे है। जब रास के दौरान गोपियों के मन में अपने सौभाग्य को लेकर अहंकार का भाव आया, तो श्रीकृष्ण अंतर्ध्यान हो गए। इस प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए मन में अहंकार का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, बल्कि सच्चा प्रेम समर्पण और विनम्रता मांगता है।

गोपी रूप जब शिवजी को धारण करना पड़ा

वृंदावन की लोक परंपरा और मंदिरों में प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान शिव भी श्रीकृष्ण की इस अद्भुत महारास लीला के दर्शन करने के लिए कैलाश से वृंदावन पहुंचे थे। चूंकि रासलीला में प्रवेश के लिए केवल ‘गोपी भाव’ की अनुमति थी, इसलिए महादेव ने गोपी का रूप धारण किया था। वृंदावन का प्रसिद्ध ‘गोपेश्वर महादेव मंदिर’ इसी पौराणिक लोक मान्यता से जुड़ा हुआ है । हालांकि, विद्वान इसे श्रीमद्भागवत के मुख्य प्रसंग से इतर लोक परंपरा का हिस्सा मानते है।

शरद पूर्णिमा के महत्वपूर्ण मुहूर्त और परंपराएं

पूर्णिमा तिथि आरंभ: 25 अक्टूबर को सुबह 11:55 बजे से
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर को सुबह 9:41 बजे तक
चंद्रोदय का समय: शाम लगभग 5:40 बजे (स्थान के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है)
चांदनी में खीर रखने का समय: चंद्रोदय के बाद से मध्यरात्रि (निशीथ काल) तक
कोजागरी लक्ष्मी पूजा (निशीथ काल): रात 11:39 से 12:30 बजे तक

धार्मिक मान्यता है कि इस रात्रि को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण रहता है, उसकी किरणों से अमृत की वर्षा होती है। इसी परंपरा के तहत लोग दूध और चावल से बनी खीर को खुले आसमान के नीचे चांदनी में रखते है। अगले दिन उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है । साथ ही, इस रात मां लक्ष्मी के पूजन और रात्रि जागरण का भी विशेष विधान है।

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