Dharm Desk : दिवाली की रात घरों में दीप जलते हैं। भगवान गणेशजी और मां लक्ष्मी की पूजा होती है। हर कोई यही चाहता है कि सालभर घर में सुख-समृद्धि बनी रहे, लेकिन दिवाली बीतते ही कुछ इलाकों में एक ऐसी रस्म भी निभाई जाती है, जिसे देखकर दूसरे क्षेत्रों के लोग हैरान हो सकते है । यहां महिलाएं सुबह होने से पहले पुराना सूप लेकर निकलती हैं और उसे लकड़ी से पीटते हुए घर के हर कोने तक जाती हैं। इसके बाद सूप को घर से बाहर छोड़ दिया जाता है। बिहार और मिथिलांचल में प्रचलित इस रस्म को ‘दरिद्र खेदना’ कहते हैं।

आखिर दीपावली के बाद ऐसा क्यों किया जाता है?

इसके पीछे मां लक्ष्मी की बहन अलक्ष्मी से जुड़ी लोककथा और पुरानी परंपरा है। यह परंपरा मुख्य रूप से बिहार, मिथिलांचल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में देखने को मिलती है । झारखंड के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में भी महिलाएं इसे निभाती हैं। हालांकि, हर जगह इसका तरीका एक जैसा नहीं है। कहीं घर की बुजुर्ग महिलाएं सूप पीटती हैं, तो कहीं परिवार की दूसरी महिलाएं भी साथ देती हैं। कुछ घरों में पुरानी झाड़ू का प्रयोग भी किया जाता है। शहरों में यह रस्म अब पहले की तुलना में कम दिखाई देती है, लेकिन गांवों में कई परिवार आज भी इसे अपनी पुरानी रीति के तौर पर निभाते है।

अलक्ष्मी को घर से विदा करने की मान्यता
इस रस्म का संबंध मां लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी से जोड़ा जाता है । लोककथाओं में अलक्ष्मी को दरिद्रता, कलह और अभाव का प्रतीक बताया है। इसके विपरीत मां लक्ष्मी धन, अन्न और खुशहाली की देवी हैं। इसी सोच के साथ दीपावली के बाद अलक्ष्मी को घर से विदा करने की रस्म निभाई जाती है। महिलाएं सूप पीटते हुए घर के भीतर से बाहर की ओर बढ़ती है। उनके मन में यही भाव रहता है कि घर से गरीबी और परेशानियां दूर हों तथा लक्ष्मी का वास बना रहे। कुछ जगहों पर इस दौरान लोकगीत और पारंपरिक बोल भी सुनाई देते है।

सूप रात के बाद या भोर में क्यों पीटा जाता है
इस रस्म के लिए आमतौर पर दिवाली की रात बीतने के बाद का समय चुना जाता है। कई परिवारों में महिलाएं तड़के, सूर्योदय से पहले सूप पीटती हैं । वे घर के कमरों, आंगन और दरवाजे तक जाती है । इसके बाद पुराने सूप को घर से दूर रख दिया जाता है। कुछ इलाकों में इसे रास्ते या गांव की सीमा के बाहर छोड़ने का चलन भी है। हालांकि, इसके लिए कोई एक तय मुहूर्त नहीं है।

सिर्फ टोटका नहीं, लोकजीवन से जुड़ी है परंपरा
सूप का प्रयोग सदियों से अनाज साफ करने के लिए होता आया है। इससे भूसी और कचरा अलग किया जाता है। शायद यही वहज है कि इसे दरिद्रता को घर से बाहर करने के भाव से भी जोड़ा गया। लोकपरंपरा में सूप पीटने की आवाज को अलक्ष्मी की विदाई का संकेत माना जाता है। कुछ धार्मिक संदर्भों में भी दीपावली के अवसर पर सूप और ढोल बजाकर अलक्ष्मी को दूर करने की बात मिलती है। इसलिए ये टोटका नहीं है। यह पीढ़ियों से चली आ रही एक क्षेत्रीय लोकपरंपरा है, जिसमें परिवार की खुशहाली और अन्न-धन की कामना जुड़ी है।