Dharm Desk – कार्तिक मास को श्री हरि की आराधना, स्नान, दान-पुण्य और दीपदान के लिए विशेष माना है। इस माह में घर के आंगन में तुलसी के पास दीपक जलाने की परंपरा है। श्रद्धालु सुबह स्नान के बाद तुलसी पूजन करते हैं और शाम को दीपदान कर भगवान विष्णु से सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते है। कार्तिक मास में तुलसी की पूजा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इसी महीने तुलसी विवाह का आयोजन होता है। यदि महीने की शुरुआत से दीपदान नहीं कर पाए तो तब भी सामर्थ्य के अनुसार बीच महीने से भी तुलसी पूजन और दीपदान शुरू किया जा सकता है।

कार्तिक मास कब तक रहेगा

उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास 27 अक्टूबर से शुरू होकर 24 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होगा। कुछ क्षेत्रों में प्रचलित अमांत पंचांग के अनुसार कार्तिक मास 10 नवंबर से शुरू होकर दिसंबर में अमावस्या तक चलेगा। इसलिए कार्तिक मास की तारीख बताते समय क्षेत्रीय पंचांग का ध्यान रखना जरूरी है।

कार्तिक मास में तुलसी दीपदान का क्या है महत्व

कार्तिक मास में तुलसीजी के सामने दीपक जलाना भगवान विष्णु की आराधना खास हाोता है। तुलसीजी को भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है। इस महीने में सूर्य उदय से पहले स्नान, तुलसी वंदना और दीपदान को विशेष धार्मिक महत्व दिया गया है। शाम को तुलसी के पास दीपक जलाकर श्रद्धालु अपने परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना करें। दीपदान का भाव केबल दीपक जलाने तक सीमित नहीं है। यह जीवन में सकारात्मकता, सेवा और सदाचार का संदेश भी देता है। इस महीने में जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जा सकता है।

बीच महीने से दीपदान कैसे शुरू करें

यदि आपने कार्तिक मास की शुरुआत से दीपदान नहीं किया है, तो अब भी इसे शुरू कर सकते हैं। इसके लिए सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और तुलसी के पास साफ-सफाई करें। इसके बाद तुलसी में जल अर्पित करें। तुलसी के पास रोली या चंदन अर्पित करें। श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु का स्मरण करें। इसके बाद मिट्टी के दीपक में घी या तिल का तेल डालकर दीपक जलाएं। शाम के समय सूर्यास्त के बाद तुलसी के पास दीपदान करना इस परंपरा का प्रमुख हिस्सा है।

पूजन में किन बातों का रखें ध्यान

कार्तिक मास में पूजा के लिए कठिन नियम अपनाना हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है। अपनी दिनचर्या और सामर्थ्य के अनुसार, नियमित पूजन करना अधिक व्यावहारिक है। इस दौरान सात्त्विक भोजन, संयमित दिनचर्या और जरूरतमंदों की सहायता पर भी ध्यान दिया जा सकता है। कार्तिक मास में किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने की परंपरा भी है। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार कोई संकल्प लेकर उसका पालन कर सकते हैं। नियमित तुलसी पूजन, दीपदान और दान-पुण्य के माध्यम से इस महीने को भक्ति और सेवा से जोड़ सकते है।