Business Desk :- क्या पारे से सोना बनाया जा सकता है? सैन फ्रांसिस्को के स्टार्टअप Marathon Fusion ने दावा किया है कि उसने फ्यूजन से पैदा होने वाले न्यूट्रॉन की मदद से पारे को शुद्ध सोने में बदलने का प्रदर्शन किया है। कंपनी का कहना है कि उसकी प्रोसेस ने 2025 में CERN के शोधकर्ताओं के बनाए रिकॉर्ड के मुकाबले 10 गुना ज्यादा रफ्तार हासिल की है।

हालांकि, कंपनी ने प्रयोग में तैयार हुए सोने की कुल मात्रा और उसकी उत्पादन लागत का खुलासा नहीं किया है। ऐसे में यह आकलन करना मुश्किल है कि इस तकनीक से व्यावसायिक स्तर पर सोना बनाना कितना व्यावहारिक होगा।

कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर यह दावा किया। उसकी पोस्ट को 65 लाख से ज्यादा बार देखा गया। इस दावे ने सदियों पुराने उस सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है कि क्या किसी दूसरे तत्व से कृत्रिम तरीके से सोना बनाया जा सकता है।

वैज्ञानिक पहले भी बना चुके हैं सोने के नाभिक

पारे को सोने में बदलने का विचार परमाणु विज्ञान के लिहाज से नया नहीं है। मई 2025 में CERN के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर के शोधकर्ताओं ने बताया था कि सीसे के परमाणु नाभिकों से जुड़ी टक्करों के दौरान सोने के नाभिक बने थे।

इससे पता चलता है कि परमाणु प्रक्रियाओं के जरिए एक तत्व को दूसरे तत्व में बदलना वैज्ञानिक रूप से संभव है। लेकिन कुछ सोने के नाभिक बनना और इतनी मात्रा में सोना तैयार करना, जिससे उसका व्यावसायिक उत्पादन किया जा सके, दो अलग-अलग बातें हैं।

पारे से सोना बनाने की प्रक्रिया कैसे काम करती है?

Marathon Fusion की बताई प्रक्रिया को न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन यानी परमाणु रूपांतरण कहा जाता है। इसमें परमाणु के नाभिक में बदलाव करके एक तत्व को दूसरे तत्व में बदला जाता है।

कंपनी के मुताबिक, इस प्रक्रिया में पारे के प्राकृतिक आइसोटोप मर्करी-198 का इस्तेमाल किया जाता है। फ्यूजन प्रक्रिया से पैदा होने वाले न्यूट्रॉन मर्करी-198 के नाभिक के साथ प्रतिक्रिया करते हैं। इससे मर्करी-197 बनता है, जो रेडियोएक्टिव होता है।

इसके बाद मर्करी-197 रेडियोएक्टिव डिके की प्रक्रिया से गोल्ड-197 में बदल जाता है। गोल्ड-197 सोने का स्थिर आइसोटोप है। हालांकि, इस प्रक्रिया में रेडियोएक्टिव बाय-प्रोडक्ट भी बन सकते हैं। इन्हें सुरक्षित तरीके से संभालना और उनसे जुड़े जोखिमों को नियंत्रित करना इस तकनीक की अहम चुनौती है।

मेडिकल इस्तेमाल के लिए रेडियोएक्टिव कॉपर बनाने का दावा

Marathon Fusion ने एक दूसरी उपलब्धि का भी दावा किया है। कंपनी के मुताबिक, उसने जिंक पर फ्यूजन से पैदा होने वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल करके रेडियोएक्टिव कॉपर आइसोटोप का उत्पादन शुरू किया है। ऐसे आइसोटोप का इस्तेमाल कुछ मेडिकल प्रक्रियाओं, खासकर बीमारी की जांच और शोध में किया जा सकता है।

कंपनी फ्यूजन तकनीक को औद्योगिक जरूरतों में इस्तेमाल करने की दिशा में भी काम कर रही है। इसमें मेडिकल आइसोटोप का उत्पादन और भविष्य में फ्यूजन पावर प्लांट के लिए जरूरी इंजीनियरिंग क्षमता विकसित करना शामिल है।

क्या बड़े पैमाने पर सोना बनाना संभव होगा?

फिलहाल कंपनी के दावे से यह स्पष्ट नहीं होता कि इस तकनीक से बड़े पैमाने पर सोना बनाना आर्थिक रूप से फायदेमंद होगा या नहीं। इसके लिए तैयार सोने की मात्रा, उसकी शुद्धता, उत्पादन लागत और प्रक्रिया को लगातार दोहराने की क्षमता से जुड़े आंकड़े जरूरी हैं।

जब तक इन पहलुओं की विस्तृत जानकारी सामने नहीं आती, तब तक पारे से सोना बनाने की इस तकनीक की व्यावसायिक संभावनाओं पर ठोस निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।