Delhi Tree Transplantation: दिल्ली के सरोजिनी नगर स्थित जनरल पूल रेजिडेंशियल एकॉमोडेशन (GPRA) कॉलोनी के पुनर्विकास प्रोजेक्ट (redevelopment project) के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों को स्थानांतरित (transplante) किया जाएगा। इसके तहत 1,049 पेड़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लगाया जाएगा, जबकि 42 पेड़ों को काटने की मंजूरी दी गई है। दिल्ली वन विभाग ने इस संबंध में 19 जून को आदेश जारी किया है। विभाग के मुताबिक, परियोजना के तहत जहां संभव होगा, वहां पेड़ों को काटने के बजाय ट्रांसप्लांट करने को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि हरित आवरण को अधिकतम बचाया जा सके।
वन विभाग के अनुसार, सरोजिनी नगर स्थित जीपीआरए (GPRA) पुनर्विकास परियोजना से शुरुआत में 1,218 पेड़ प्रभावित हो रहे थे। विस्तृत जांच के दौरान 48 पेड़ परियोजना क्षेत्र से बाहर पाए गए, जबकि सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) के निर्देश पर 79 अन्य पेड़ों को भी बचा लिया गया। इसके बाद प्रभावित पेड़ों की कुल संख्या घटकर 1,091 रह गई। वन विभाग के आदेश के मुताबिक, इनमें से 1,049 पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया जाएगा, जबकि 42 पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है। इस पूरे कार्य की जिम्मेदारी NBCC को सौंपी गई है। एजेंसी को निर्देश दिया गया है कि सभी ट्रांसप्लांट किए जाने वाले पेड़ों को द्वारका स्थित भारत वंदना पार्क में स्थानांतरित किया जाए। इसके अलावा, पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए 10,910 देशी प्रजातियों के नए पौधे लगाने भी अनिवार्य किए गए हैं। वन विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ नई जगह पर जीवित नहीं रह पाते हैं, तो NBCC को निर्धारित नियमों के अनुसार अपने खर्च पर अतिरिक्त पेड़ लगाने होंगे, ताकि हरित आवरण की भरपाई सुनिश्चित की जा सके।
कैसे होता है बड़े पेड़ों का ट्रांसप्लांट?
बड़े पेड़ों का ट्रांसप्लांट एक जटिल और तकनीकी प्रक्रिया है। यह किसी छोटे पौधे को उखाड़कर दूसरी जगह लगाने जितना आसान नहीं होता। इस पूरी प्रक्रिया में विशेषज्ञों की निगरानी, आधुनिक मशीनों और लंबे समय तक देखभाल की जरूरत होती है। सबसे पहले विशेषज्ञ यह तय करते हैं कि कौन-सा पेड़ सुरक्षित रूप से ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। इसके बाद पेड़ की जड़ों के चारों ओर बड़े दायरे में खुदाई की जाती है, ताकि जड़ों के साथ पर्याप्त मात्रा में मिट्टी सुरक्षित रह सके। जड़ों और मिट्टी के इस हिस्से को ‘रूट बॉल’ कहा जाता है, जिसे विशेष सामग्री से मजबूती से बांधा जाता है ताकि स्थानांतरण के दौरान जड़ों को नुकसान न पहुंचे।
इसके बाद क्रेन और अन्य भारी मशीनों की सहायता से पूरे पेड़ को सावधानीपूर्वक उठाकर ट्रक पर रखा जाता है और तय स्थान तक पहुंचाया जाता है। नई जगह पर पहले से तैयार गड्ढे में पेड़ को लगाया जाता है और उसे स्थिर रखने के लिए आवश्यक सहारे दिए जाते हैं। ट्रांसप्लांट के बाद की देखभाल इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। कई महीनों तक नियमित सिंचाई, खाद देना, मिट्टी की नमी बनाए रखना और पेड़ को सहारा देना जरूरी होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रांसप्लांट के बाद के शुरुआती कुछ महीने सबसे अहम होते हैं, क्योंकि इसी दौरान यह तय होता है कि पेड़ नई जगह पर सफलतापूर्वक जीवित रह पाएगा या नहीं।
क्या ट्रांसप्लांट के बाद नई जगह जीवित रह पाते हैं पेड़?
ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ों के नई जगह पर जीवित रहने की संभावना कई कारकों पर निर्भर करती है। विशेषज्ञों के अनुसार, पेड़ की प्रजाति, उसकी उम्र, जड़ों की स्थिति, मौसम, ट्रांसप्लांट की तकनीक और बाद में की जाने वाली देखभाल इस प्रक्रिया की सफलता तय करती है। यदि ट्रांसप्लांट वैज्ञानिक तरीके से किया जाए और उसके बाद लंबे समय तक नियमित निगरानी, सिंचाई, खाद और उचित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए, तो कई पेड़ नई जगह पर सफलतापूर्वक विकसित हो जाते हैं। हालांकि, पर्याप्त देखभाल नहीं मिलने या प्रतिकूल परिस्थितियों में कई पेड़ सूख भी जाते हैं। इसलिए विशेषज्ञ ट्रांसप्लांट के बाद की निगरानी को पूरी प्रक्रिया का सबसे अहम चरण मानते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार की ट्री ट्रांसप्लांटेशन पॉलिसी-2020 में ट्रांसप्लांट की पूरी प्रक्रिया की जियो-टैग्ड तस्वीरें अपलोड करना और हर वर्ष प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य किया गया है। इसका उद्देश्य स्थानांतरित किए गए पेड़ों की नियमित निगरानी करना और उनके जीवित रहने की स्थिति का पारदर्शी रिकॉर्ड बनाए रखना है।
पेड़ों के ट्रांसप्लांट पर पर्यावरणविदों ने जताई चिंता
सरोजिनी नगर पुनर्विकास परियोजना के तहत बड़ी संख्या में पेड़ों के ट्रांसप्लांट के फैसले पर पर्यावरणविदों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि ट्रांसप्लांटेशन पेड़ों को बचाने का एक विकल्प जरूर है, लेकिन इसकी सफलता हर बार सुनिश्चित नहीं होती। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कई मामलों में ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ों की वास्तविक जीवित रहने की दर सार्वजनिक नहीं की जाती। उनका कहना है कि स्थानांतरित पेड़ों की स्थिति और क्षतिपूरक पौधारोपण (Compensatory Plantation) की स्वतंत्र एजेंसियों से नियमित निगरानी कराई जानी चाहिए, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।
विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली पहले से ही वायु प्रदूषण, बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में वर्षों पुराने और परिपक्व पेड़ों का संरक्षण शहर के पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने, तापमान नियंत्रित रखने और वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पर्यावरणविदों का कहना है कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ हरित आवरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। उनके अनुसार, शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
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