Odisha Desk, पूरी: महाप्रभु श्री जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए रथ निर्माण का कार्य अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। कल रथ निर्माण का 75वां दिन था। रथ निर्माण में जुटे सेवक और कारीगर मुख्य महाराणा के मार्गदर्शन में सुबह से ही पूरे उत्साह के साथ काम में लग रहे। तीनों रथों के ‘दुआरा बेढ़ा’ (दरवाजे के घेरे) को मजबूती से बांधने और उसकी तैयारी का काम मुख्य रूप से किया गया।

कारीगरों द्वारा प्रत्येक दुआरा बेढ़ा के ‘नाट गोड़’ (मुख्य खंभे) के साथ चौदह नाहाका में दो-दो सपोर्ट बटन लगाने के लिए ‘दुआरा बाणिया’ सेवक पूरी तत्परता से जुटे हुए हैं। प्रत्येक रथ में इस प्रकार के 16-16 फिटिंग किए जाने की व्यवस्था है। इसके साथ ही रथ के सिंहासन के चारों कोनों पर लकड़ी के पटरे (पटा) बिछा दिए गए हैं और वेदी के चारों कोनों पर ‘पारुस पटा’ लगाने का काम भी आज संपन्न हो गया। दूसरी ओर, नए ब्रेक पुली में लोहे के कड़े फिट करने का काम पूरा कर लिया गया है।

चित्रकार सेवकों ने रथ की ‘प्रभा’ (पीछे का कलात्मक चक्र) पर खूबसूरत रंग भरने के लिए सबसे पहले सफेद प्राइमर लगाने का काम पूरा किया और अब मुख्य रंगाई का काम शुरू कर दिया गया है।

परंपरा के अनुसार-

तालध्वज रथ: इस रथ की प्रभा पर नक्काशीदार आकृतियों को रंगने के साथ-साथ बीच में कमल की कली और दोनों तरफ भगवान शिव व देवर्षि नारद के चित्र बनाए जाएंगे।

दर्पदलन रथ: इस रथ की प्रभा पर कमल की कली के साथ दोनों ओर पवित्र नदी देवी गंगा और यमुना के चित्र सुशोभित होंगे।

नंदिघोष रथ: इस रथ की प्रभा पर कमल की कली के साथ देवराज इंद्र और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा के चित्र अंकित किए जाने का विधान है।

रथ के दुआरा बेढ़ा और ‘चंद्र शाली’ के लिए रंग-बिरंगे कपड़ों की कटाई के साथ-साथ उस पर चांदी की जरी (सिल्वर जरी) से बारीक कारीगरी का काम शुरू हो गया है। वहीं, दोलवेदी परिसर में बनी अस्थायी कार्यशाला में ‘ओझा कमार’ (लुहार सेवक) बड़ी तेजी से ‘ध्वज बता कांटा’ (कीलें) और तीनों रथों के लिए ‘प्रभा बिड़िया कांटा’ बनाने में जुटे हुए हैं। महाप्रभु का रथ निर्माण कार्य अब युद्ध स्तर पर आगे बढ़ रहा है।

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