समीर शेख, बड़वानी। मध्य प्रदेश में रेत माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि रात के अंधेरे के बजाय दिनदहाड़े नर्मदा का सीना छलनी कर रहे हैं। जिला मुख्यालय से करीब 10 से 12 किलोमीटर दूर नर्मदा के डूब क्षेत्र में स्थित पीपलूद, बड़दा और खेड़ी गांवों में चौंकाने वाला दृश्य देखने को मिला। यहां नर्मदा किनारे भारी-भरकम पोकलेन मशीनें लगातार नदी का सीना चीर रही थीं। गहरे गड्ढों से रेत निकालकर डंपरों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरी जा रही थी, जबकि वाहनों की आवाजाही बिना रुके जारी थी। 

मौके पर ऐसा लग रहा था मानो नदी के किनारे पर एक व्यवस्थित खनन स्थल संचालित किया जा रहा हो। दूर से ही मशीनों की आवाज और रेत से भरे वाहनों की आवाजाही साफ दिखाई दे रही थी। नदी किनारे बड़े-बड़े गड्ढे बनाकर पोकलेन मशीनों से लगातार रेत निकाली जा रही थी। निकाली गई रेत को तत्काल डंपरों में भरकर रवाना किया जा रहा था। आसपास बड़ी मात्रा में मिट्टी के ढेर भी जमा किए गए थे। 

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह गतिविधियां एक-दो दिन नहीं, बल्कि लंबे समय से लगातार चल रही हैं। प्रत्यक्ष रूप से मौके पर करीब छह पोकलेन मशीनें, एक दर्जन से अधिक डंपर तथा बड़ी संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉलियां सक्रिय दिखाई दीं। मशीनें लगातार उत्खनन करती रहीं और वाहन रेत भरकर निकलते रहे। ऐसे में सवाल खड़े हो रहे हैं कि इतनी बड़ी गतिविधि जिम्मेदार विभागों की नजर से कैसे ओझल रही?

इसी बीच नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने भी जिले में जारी कथित अवैध रेत उत्खनन को लेकर जिला प्रशासन और खनिज विभाग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों के बावजूद नर्मदा तटीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्खनन हो रहा है। उनका आरोप था कि बाहरी लोग रॉयल्टी और ठेके की आड़ में नियमों के विपरीत खनन कर रहे हैं, जबकि जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक बने हुए हैं

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