स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की 81 दिवसीय “गाविष्ठि (गो-रक्षार्थ धर्मयुद्ध) यात्रा” अब केवल धार्मिक यात्रा नहीं रह गई है। यात्रा के पहले सात दिनों की जमीनी तस्वीरों, आयोजकों, स्वागतकर्ताओं और राजनीतिक रूप से सक्रिय चेहरों को देखने के बाद यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या गौ-रक्षा के नाम पर एक समानांतर राजनीतिक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश हो रही है?
2 मई से शुरू हुई इस यात्रा में अब तक जिन जिलों गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बलिया, मऊ और गाजीपुर में कार्यक्रम हुए, वहां एक समान पैटर्न स्पष्ट दिखाई दिया। यात्रा के स्वागत, प्रबंधन और भीड़ जुटाने में सबसे ज्यादा सक्रियता समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से जुड़े नेताओं की रही। कई स्थानों पर स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क ही यात्रा की रीढ़ बने दिखाई दिए, जबकि आम जनता की स्वतःस्फूर्त भागीदारी बेहद सीमित या बिल्कुल भी नहीं रही।
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यात्रा की शुरुआत 3 मई को गोरखपुर से हुई थी, जहां स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वकील मनीष पांडे के घर ठहरे। यात्रा के प्रभारी शशिकांत यादव और आयोजक दुर्गेश मिश्र बताए गए। मीडिया प्रबंधन के लिए अलग से व्हाट्सएप ग्रुप तक बनाया गया। लेकिन यात्रा के पहले ही दिन घोषित प्रेस ब्रीफिंग तक नहीं हो सकी और रथ यात्रा की जगह लग्जरी बस से प्रस्थान करना पड़ा। सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुलाकात की हुई, वह थी चिल्लूपार के पूर्व विधायक विनय शंकर तिवारी से मुलाकात। विनय शंकर तिवारी बाहुबली राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में रहे हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं। गौ-रक्षा यात्रा के शुरुआती चरण में ही इस मुलाकात ने यात्रा की राजनीतिक दिशा को लेकर सवाल खड़े कर दिए।
4 मई को यात्रा कुशीनगर पहुंची तो यहां स्वागत की कमान समाजवादी पार्टी सरकार के पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री राधेश्याम सिंह के हाथ में दिखाई दी। कप्तानगंज चौराहे पर उनके नेतृत्व में स्वागत कार्यक्रम आयोजित हुआ। यात्रा के धार्मिक कार्यक्रम जरूर हुए, लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चा का केंद्र राजनीतिक चेहरों की सक्रियता ही रही। यात्रा में भीड़ सीमित दिखाई दी और अधिकांश कार्यक्रम पूर्व निर्धारित नेटवर्क के जरिए संचालित होते नजर आए।
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देवरिया में यात्रा के दौरान बरहज विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस से जुड़े वशिष्ठ गोस्वामी और समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रत्याशी मुरली मनोहर जायसवाल सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई दिए। मुरली मनोहर जायसवाल के पिता राम प्रसाद जायसवाल बसपा के पूर्व विधायक रहे थे। इसके अलावा सपा नेता संतोष यादव भी स्वागत कार्यक्रमों में प्रमुख रूप से मौजूद रहे। भाटपार रानी में भाजपा नेता रविंद्र कुशवाहा के करीबी माने जाने वाले प्रोफेसर बैरिस्टर राय भी दिखे, लेकिन कार्यक्रम औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ सका। स्थानीय फीडबैक में यह बात लगातार सामने आई कि धार्मिक यात्रा की तुलना में राजनीतिक नेटवर्क ज्यादा सक्रिय दिख रहा था।
बलिया में यात्रा का राजनीतिक रंग सबसे ज्यादा गहरा दिखाई दिया। यहां समाजवादी पार्टी के पूर्व चेयरमैन संजय उपाध्याय, सपा नेता अनिल राय और कांग्रेस नेता ओमप्रकाश पांडे यात्रा के स्वागत में प्रमुख रूप से सक्रिय रहे। सहतवार क्षेत्र में सपा से जुड़े प्रभावशाली नेता नीरज सिंह ‘गुड्डू’ और उनके नेटवर्क ने कार्यक्रमों की कमान संभाली। उनकी पत्नी वर्तमान में नगर पंचायत अध्यक्ष हैं। श्रीरामपुर में सपा युवजन सभा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व एमएलसी प्रत्याशी अरविंद गिरी की मौजूदगी ने यात्रा के राजनीतिक संदेश को और स्पष्ट कर दिया। सपा नेता भानु दुबे भी सक्रिय रहे। धार्मिक यात्रा के नाम पर विपक्षी नेताओं की इतनी संगठित उपस्थिति ने स्थानीय स्तर पर नई चर्चाओं को जन्म दिया।
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मऊ में तो यात्रा लगभग पूरी तरह विपक्षी दलों के स्थानीय नेटवर्क के सहारे चलती दिखाई दी। सपा जिलाध्यक्ष दूधनाथ यादव, सपा नेता पंकज उपाध्याय और बृजेश यात्रा में प्रमुख रूप से सक्रिय रहे। कांग्रेस जिला प्रवक्ता रमन पांडे भी यात्रा के स्वागत कार्यक्रमों में दिखाई दिए। पूर्व विधायक परिवार से जुड़े सुजीत सिंह की मौजूदगी भी चर्चा में रही। हिंदू जागरण मंच के पूर्व जिलाध्यक्ष अभय सिंह भी कार्यक्रमों में शामिल हुए, लेकिन समग्र रूप से तस्वीर विपक्षी दलों के राजनीतिक प्रभुत्व वाली ही दिखाई दी।
9 मई को यात्रा के सातवें दिन गाजीपुर में भी वही पैटर्न दोहराया गया। आयोजकों में सपा नेता मुन्नन यादव, कांग्रेस जिलाध्यक्ष सुनील राम और कांग्रेस प्रवक्ता अजय श्रीवास्तव प्रमुख रूप से सक्रिय दिखाई दिए। इसके अलावा समाजवादी पार्टी से जुड़े सुजीत यादव, महिला सभा जिलाध्यक्ष विभा पाल और महिला प्रदेश सचिव पुनिता यादव भी यात्रा से जुड़ी गतिविधियों में शामिल रहीं।
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सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह यात्रा केवल गौ-रक्षा और धर्म जागरण के लिए है, तो फिर लगभग हर जिले में विपक्षी राजनीति से जुड़े चेहरे ही इसकी मुख्य ताकत क्यों बनते दिखाई दे रहे हैं? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि गौ-रक्षा जैसे भावनात्मक मुद्दे पर निकली यात्रा में स्वतः उमड़ने वाला जनसमर्थन आखिर क्यों नहीं दिख रहा? अधिकांश स्थानों पर भीड़ सीमित रही, कार्यक्रम औपचारिक नजर आए और यात्रा स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क के सहारे चलती दिखाई दी।
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